SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 515
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गाचा ३८४-३८७ शानमारमा/४१ होता है वह काल को अपेक्षा प्राबली के असंख्यात भाग को जानता है, क्योंकि ऐसा स्वभाव है। पावली के असंख्यातवें भाग प्रमाण काल के भीतर अतीत और अनागत द्रव्य को जानता है। यह अभिप्राय है । पावली के असंख्यातवे भाग का प्रावली में भाग देने पर जघन्य अवधि का काल प्रावली के असंख्यातवें भाग मात्र होता है। इतने मात्र काल में जो कार्य हो चुका हो और जो होनेवाला हो उसे जघन्य अवधिज्ञानी जानता है। शङ्का-इसका काल इतना ही है, यह जैसे जाना जाता है ? समाधान-जघन्य क्षेत्र व काल क्रमश: घनांगुल और पावली के असंख्यातवें भाग प्रमाण है (गा. ४०४)। इस गाथा सूत्र के कथन से जाना जाता है । जघन्य भाव-अपना जो जाना हा द्रव्य है उसकी अनन्त वर्तमान पर्यायों में से जघन्य अवधिज्ञान के द्वारा विषयीकृत पावली के असंख्यातवें भाग पर्यायें जघन्य भाव ही जघन्य द्रव्य के ऊपर स्थित रूप, रस, गन्ध एवं स्पर्श प्रादि रूप सब पर्यायों को उक्त अवधिज्ञान जानता है, ऐसा कहते हैं। किन्तु यह घटित नहीं होता, क्योंकि वे अनन्त हैं । और उत्कृष्ट भी अवधिज्ञान अनन्त संख्या के जानने में समर्थ नहीं है। क्योंकि आगम में वैसे उपदेश का प्रभाव है। शङ्का - द्रव्य में स्थित अनन्त पर्यायों को प्रत्यक्ष से न जानता हुमा अवधिज्ञान प्रत्यक्ष से द्रव्य को कैसे जानेगा? समाधान नहीं, क्योंकि उक्त अवधिज्ञान पर्याय के अवयवों में रहनेवाली अनन्त संख्या को छोड़कर असंख्यात पर्यायावयत्रों से विशिष्ट द्रव्य का ग्राहक है। शङ्का - अतीत व अनागत पर्यायों की 'भाव' संज्ञा क्यों नहीं की गई ? समाधान नहीं की गई, क्योंकि उनको काल स्वीकार किया गया है । द्रव्यादि चतुष्टय की अपेक्षा देशावधि ज्ञान के विकल्प अवरद्दध्यादुवरिमदव्ववियप्पाय होदि धुवहारो । सिद्धारणंतिमभागो अभवसिद्धादरपंतगुणो ॥३८४॥ धुवहारकम्मवग्गरणगरणगारं कम्मवगणं गणिदे । समयपबद्धपमाणं जाणिज्जो प्रोहिविसयम्हि ।।३८५।। मणदव्ववग्गणाण वियप्पाणंतिमसमं ख धुवहारो। अवरुक्कस्सविसेसा रूवहिया तबियप्पा हु ॥३८६॥ प्रवरं होदि अरणंतं प्रतभागेरण अहियमुक्कस्सं ।। इदि मणभेदाणंतिमभागो दन्वम्मि धुवहारो ॥३८७॥ १. व. पु. १३ पृ. ३७५। २. ध. पृ. ६ पृ. २६-२७ । ३. घ. पु. ६ पृ. २७-२८ |
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy