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________________ ४८०/गो. सा. जीवकाण्ड माथा ३७७-३८३ 'जितनी सूक्ष्म निगोद जीव की जघन्य अवगाहना है उतना ही जघन्य अवधि का क्षेत्र है ऐसा कहनेवाले गाथासूत्र के साथ विरोध होगा। चूकि अवधिज्ञानी एक श्रेणी में ही जानता है, अतएव सूत्रविरोध नहीं होगा, ऐसा कितने ही प्राचार्य कहते हैं। परन्तु यह भी घटित नहीं होता, क्योंकि, ऐसा माननेपर चक्षु-इन्द्रियजन्य ज्ञान की अपेक्षा भी उसमान्यता का प्रसंग आगा। कारण कि चक्षु इन्द्रियजन्य ज्ञान से संख्यात सूच्यंगुल विस्तार, उत्सेध और पायाम रूप क्षेत्र के भीतर स्थित बस्तु का ग्रहण देखा जाता है। तथा वैसा मानने पर इस जघन्य अवधिज्ञान के क्षेत्र का आयाम असंख्यात योजन प्रमाण प्राप्त होगा। शङ्का--यदि उक्त अवधिक्षेत्र का आयाम असंख्यातगुणा प्राप्त होता है तो होने दीजिए, क्योंकि, वह इष्ट ही है ? समाधान-ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इसके काल से असंख्यातगुरणे अर्ध मास काल से अनुमित असंख्यातगुणे भरत रूप अवधिक्षेत्र में भी असंख्यात योजन प्रमाण आयाम नहीं पाया जाता। दूसरे, उत्कृष्ट देशाबधिज्ञानी संयत अपने उत्कृष्ट द्रव्य को आदि करके एक परमाणु आदि अधिक ऋम से स्थित घनलोक के भीतर रहनेवाले सब पुद्गलस्कन्धों को क्या युगपत् जानता है या नहीं जानता ? यदि नहीं जानता है तो उसका अवधिक्षेत्र लोक नहीं हो सकता, क्योंकि, वह एक प्राकाशश्रेणी में स्थित पुद्गलस्कन्धों को ग्रहण करता है और यह एक आकाशपंक्ति घनलोक प्रमाण हो नहीं सकती, क्योंकि, घनलोक के असंख्यातवें भाग रूप उसमें घनलोकप्रमाणत्व का विरोध है। इसके अतिरिक्त वह कुलाचल, मेरुपर्वत, भवनबिमान, पाठ पृथिवियों, देव, विद्याधर, गिरगिट और सरीमपादिकों को भी नहीं जान सकेगा, क्योंकि, इनका एक प्राकाश में प्रवस्थान नहीं है। और वह उनके अवयव को भी नहीं जानेगा, क्योंकि, अवयवी के अज्ञात होनेपर 'यह इसका अवयव है' इस प्रकार जानने की शक्ति नहीं हो सकती। यदि वह युगपत् सब घनलोक को जानता है तो हमारा पक्ष सिद्ध है, क्योंकि वह प्रतिपक्ष से रहित है। सूक्ष्म निगोद जीव की अवगाहना को धनप्रतराकार से स्थापित करने पर एक आकाश विस्तार रूप अनेक श्रेणीको ही जानता है, ऐसा कितने ही प्राचार्य कहते हैं। परन्तु यह भी घटित नहीं होता, क्योंकि ऐसा होनेपर 'जितनी सूक्ष्म निगोद जीव की जघन्य अवगाहना है उतना ही जघन्य अवधि का क्षेत्र है', ऐसा कहने वाले गाथासूत्र के साथ विरोध होगा और छद्मस्थों के अनेक श्रेणियों का ग्रहण विरुद्ध नहीं है, क्योंकि, चक्ष-इन्द्रियजन्य ज्ञान से अनेक श्रेणियों में स्थित पुद्गलस्कान्धों का ग्रहण पाया जाता है। अवधिज्ञान के जघन्यक्षेत्र का प्रमाण सूक्ष्म लब्ध्यपर्याप्त निगोदिया जीव की जघन्य अवगाहना के सदृश है अतः उसका क्षेत्र उत्सेधांगुल से कहा गया। उससे प्रागे क्षेत्र का कथन प्रमाण धनांगुल से है, क्योंकि देव, नारकी, तिर्यंच और मनुष्यों के उत्सेध के कथन के सिवा अन्यत्र प्रमाणांगुल की अपेक्षा कथन होता है।' जघन्य काल--अंगुल के असंख्यात खण्डों में से एक खण्ड मात्र जिस अवधिज्ञान का क्षेत्र । १. ध. पु. १३ पृ. ३०४ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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