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________________ गाथा ३.७७-३८३ ज्ञानमार्गरणा/४७९ शङ्का-इस जघन्य अवधिज्ञान के क्षेत्र को एक आकाशप्रदेशगंक्तिरूप से स्थापित करके उसके भीतर स्थित जघन्य द्रव्य को जानता है, ऐसा यहाँ छपा नहीं ग्रहण करते? समाधान नहीं, क्योंकि ऐसा ग्रहण करने पर जघन्य अवगाहना से असंख्यातगुणे जघन्यअवधिज्ञान के क्षेत्र का प्रसंग प्राप्त होता है। जो जघन्य अवधिज्ञान से अवरुद्ध क्षेत्र है, वह जघन्य अवधिज्ञान का क्षेत्र कहलाता है। किन्तु यहाँ पर वह जघन्य अवगाहना से असंख्यातगुणा दिखाई देता है। यथा-जितना जघन्य अवगाहना के क्षेत्र का प्रायाम है तत्प्रमाण जवन्य द्रव्य के विष्कम्भ और उत्सेध रूप से स्थित अवधिज्ञान के क्षेत्र का क्षेत्रफल लाने पर जघन्य अवगाहना को जघन्य द्रव्य के विष्कम्भ और उत्सेध से गुणित करने पर जघन्य अवगाहना से असंख्यात गुणा क्षेत्र उपलब्ध होता है। परन्तु यह क्षेत्र इसी प्रकार होता है, यह कहना भी योग्य नहीं है। क्योंकि "जितनी जघन्य अवगाहना है उतना ही जघन्य अवधिज्ञान का क्षेत्र है।" ऐसा प्रतिपादन करने वाले सूत्र के साथ उक्त कथन का विरोध होता है। और इस तरह से स्थापित जघन्यक्षेत्र के अन्तिममाकाशप्रदेश में जघन्य द्रव्य समा जाता है, ऐसा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि एक जीव से सम्बन्ध रखने वाले, बिनसोपचयसहित नोक मं के पिण्डरूप और घनलोक का भाग देने पर प्राप्त हुए एक खण्डमात्र जअन्य द्रव्य की एक बर्गरगा की भी अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण अवगाहना उपलब्ध होती है। अवधिज्ञानी एक आकाशप्रदेशमुची रूप से जानता है, यह कहना भी युक्त नहीं है, क्योंकि ऐसा मानने पर बह जघन्य मतिज्ञान से भी जघन्य प्राप्त होता है और जघन्य द्रव्य के जानने का अन्य उपाय भी नहीं रहता। इसलिए जघन्य अवधिज्ञान के द्वारा अवरुद्ध हुए सब क्षेत्र को उठाकर घनप्रतर के प्राकाररूप से स्थापित करने पर सूक्ष्म निगोद लब्ध्यपर्याप्तक जीव की जघन्य अवगाहना प्रमाग होता है, ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए। जघन्य अवधिज्ञान से सम्बन्ध रखने वाले क्षेत्र का क्या विष्कम्भ है, क्या उत्सेध है और क्या आयाम है; ऐसा पूछने पर कहते हैं कि इस सम्बन्ध में कोई उपदेश उपलब्ध नहीं होता। किन्तु घनप्रतराकाररूप से स्थापित अवधिज्ञान सम्बन्धी क्षेत्र का प्रमाण उत्सेधधनांगुल के असंख्यातवें भाग है, यह उपदेश अवश्य ही उपलब्ध होता है। इस पल्योपम के असंख्यातवें भाग का बनांगुल में भाग देनेपर घनांगुल के असंख्यातवें भाग सूच्यंगुल के असंख्यातवें भाग मात्र उत्सेध, विष्कम्भ व पायाम रूप क्षेत्र पाता है। यह जघन्य अवधिक्षेत्र अर्थात् जघन्य अवधिज्ञान से विषय किया गया सम्पूर्ण क्षेत्र है और घनप्रत राकार से ही सब अवधिक्षेत्र अवस्थित है, ऐसा नियम नहीं है। किन्तु सूक्ष्म निगोद जीव के अवगाहनाक्षेत्र के समान अनियत आकारवाले अवधिक्षेत्रों का समीकरण कर घनप्रतराकार से करके प्रमाणप्ररूपणा की जाती है, ऐसा करने के बिना उसका कोई उपाय नहीं है। सूक्ष्म निगोद जीव को जवन्य अवगाहना मात्र यह सब ही जघन्य अवधिज्ञान का क्षेत्र अबधिज्ञानी जीव और उसके द्वारा ग्रहण किये जानेवाले द्रव्य का अन्तर है, ऐमा कितने ही प्राचार्य कहते हैं। परन्तु यह घटित नहीं होता, क्योंकि, ऐसा स्वीकार करने से सूक्ष्म निगोद जीव की जघन्य अवगाहना से अघन्य अवधिज्ञान के क्षेत्र के असंख्यातगुणे होने का प्रसंग पाएगा। शङ्का-असंख्यातगुणा कसे होगा? समाधान --क्यों कि, जघन्य अवधिज्ञान के विषयभूत क्षेत्र के विस्तार और उत्सेत्र से पायाम को गुणा करने पर उससे असंख्यातगुणत्व सिद्ध होता है और असंख्यातगुणत्व सम्भव है नहीं, क्योंकि,
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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