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________________ गाथा ३७६ ज्ञानमार्गणा/४७५ अपने उत्पन्न होने के भव में ही केवलज्ञान की उत्पत्ति का कारण है और अप्रतिपाती है। परमावधिज्ञान की उत्पत्ति संयतों के ही होती है। परमावधिज्ञान के उत्पन्न होने पर यह जीव न कभी मिथ्यात्व को प्राप्त होता है और न कभी असंग्रम को प्राप्त होता है । शङ्का–परमावधि ज्ञानी के मरकर देवों में उत्पन्न होने पर असंयम की प्राप्ति कैसे नहीं होती? ___समाधान-नहीं, क्योंकि परमावधिज्ञानियों का प्रतिपात नहीं होने से देवों में उनका उत्पाद सम्भव नहीं है। सर्व का अर्थ केवलज्ञान है । सर्ब अवधि अर्थात् सर्व है मर्यादा जिम्म ज्ञान की, वह सर्वावधि हीयमान अवधिज्ञान का परमावधि और सविधि में अन्तर्भाव नहीं होता, क्योंकि परमावधि और सर्वावधि में हानि नहीं होती। जो अवधिज्ञान उत्पन्न होकर शुक्ल पक्ष के चन्द्रमण्डल के समान, जब तक अपने उत्कृष्ट विकल्प को प्राप्त होकर केवलज्ञान को उत्पन्न कर विनष्ट नहीं हो जाता, तब तक प्रतिसमय बढ़ता ही रहता है वह वर्धमान अवधिज्ञान है उसका परमावधि सर्वावधि में अन्तर्भाव होता है। इससे सिद्ध है कि परमावधि ब सर्बावधि अप्रतिपाती हैं और मिथ्यात्व व असंयम को प्राप्त नहीं होते। परमावधिज्ञान और सर्वावधिज्ञान अप्रतिपाती, अविनश्वर हैं, केवलज्ञान के उत्पन्न होने तक रहते हैं । द्रव्यादि चतुष्टय की अपेक्षा अवधिज्ञान का विषय दव्यं खेत्तं कालं भावं पडि रूवि जाररावे मोही। प्रवरादुक्कस्सोत्ति य वियप्परहिदो दु सखोही ॥३७६॥ गाथार्थ-जघन्य भेद से लेकर उत्कृष्ट भेद तक सर्व ही अवधिज्ञान द्रव्य क्षेत्र काल भाव से रूपी द्रव्य को जानते हैं। सर्वावधि ज्ञान में जघन्य उत्कृष्ट का विकल्प नहीं है ।।३७६।। महास्कन्ध से लेकर परमाणु पर्यन्त समस्त पुद्गल द्रव्यों को असंख्यात लोकप्रमाण क्षेत्र, काल और भावों को तथा कर्म के सम्बन्ध पुद्गल भाव (मूर्तीपने) को प्राप्त हुए जीवों को जो प्रत्यक्ष रूप से जानता है, वह अवधिज्ञान' है।६ अरूपी (अमूर्त) द्रव्य का प्रतिषेध करने के लिए रूपगत विशेषण दिया है। शङ्का- यदि इस (अवधिज्ञान) के द्वारा केवल रूपी द्रव्य ही ग्रहण किया जाता है तो फिर १, "सगुप्पणभवे नेव केवसणाणुष्पत्तिकारपत्तादो, अपरिवादित्तादो वा। "[धवल पु. ९ पृ. ४१] । २. परमोहिणासे सो जीदो मिच्छतं रा कयावि मच्छदि, असंजम पि गो गच्छदि ति भरिषद होदि ।" [धबल पु. १३ पृ. ३२३]। ३. "सब केवलगाएं। सम्वमोही मज्जामा जस्स पास्स त सवोहिरणारणं ।" [धवल पु. १३ पृ. ३२३] ४. धवल पु. १३ पृ. २६३। ५. प. पु. १३ पृ. ३२८१ ६. ज.ध.पु. १ पृ. ४३ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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