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________________ ४७४/गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ३:१४-३७५ देशावधि– 'देश' का अर्थ सम्यक्त्व है, क्योंकि वह संयम का अवयव है। वह जिस ज्ञान की अवधि (मर्यादा) है वह देशावधि ज्ञान है। उसके होने पर जीव मिथ्यारव को भी प्राप्त होता है और असंयम को भी प्राप्त होता है, क्योंकि ऐसा होने में कोई विरोध नहीं है।' परमावधि ज्ञान और सर्वावधि ज्ञान चरमशरीरी संयतों के ही होता है ; देव व नारकियों के संयम सम्भव नहीं है अतः देव ब नारकियों के परमावधि व सविधि ज्ञान नहीं होता। परिशेष न्याय से उनके देशावधिज्ञान ही होता है। इसीलिए देव ब नारकियों के भवप्रत्यय अवधिज्ञान को देशावधि कहा गया है। सर्वावधि व परमावधि ज्ञान संयतों के ही होता है, अत: वे गुण प्रत्यय ही होते हैं। मनुष्य व तिर्यंचों के जो देशावधि ज्ञान होता है वह गुणप्रत्यय ही है क्योंकि मनुष्य और तिर्यचों के भवप्रत्यय अवधिज्ञान नहीं होता, वह देव व नारकियों के होता है । देसोहिस्स य प्रवरं परतिरिये होदि संजदम्हि वरं । परमोही सम्वोही चरमसरीरस्स विरदस्स ॥३७४।। गाथार्थ- जघन्य देशावधि ज्ञान मनुष्य व तियचों के होता है। उत्कृष्ट देशावधिज्ञान संयत के ही होता है। परमावधि और सर्वावधि ज्ञान चरमशरीरी विरत (संयत) के होता है ।।३७४।। विशेषार्थ - "उक्कस्सं माणुसेसु य माणुस-तेरिच्छए जहण्णोही ।'3 उत्कृष्ट अवधिज्ञान तिर्यंच, देव और नारकियों के नहीं होता, क्योंकि उनके संयम नहीं हो सकता, मात्र मनुष्यों के होता है, उनमें भी संयमी मनुष्य के होता है अन्य के नहीं। अर्थात् उत्कृष्ट अवधिज्ञान महा ऋषियों के ही होता है। जघन्य अवधिज्ञान देव व नारकियों के नहीं होता, किन्तु सम्यग्दृष्टि मनुष्य व तियचों के ही होता है। आगे गाथा ३७८ में जघन्य अवधिज्ञान का क्षेत्र सूक्ष्म निगोदिया लब्ध्यपर्याप्तक की जघन्य अवगाहना प्रमाण और काल प्रावली का असंख्यातवाँ भाग (गाथा ३८३ में) कहा जाएगा। किन्तु नरक में जघन्य क्षेत्र एक कोस (गाथा ४२४) और देवों में जघन्य पच्चीस योजन (गाथा ४२६) वाहा जावेगा; इससे जाना जाता है कि जघन्य अवधिज्ञान देब व नारकियों के नहीं होता। परमावधि और सविधि का कथन ३७३ के विशेषार्थ में किया जा चुका है। पडिवावी देसोही अप्पडिवादी हवंति सेसा प्रो। मिच्छतं अविरमणं ग य पडिवज्जति चरिमदुगे ॥३७५।। गायार्थ-देशावधि प्रतिपाती है और शेष दो अप्रतिपाती हैं। अन्तिम दो अवधिज्ञान मिथ्यात्व व असंयम को प्राप्त नहीं होते ।।३७५।। विशेषार्थ—देशावधिज्ञान के होने पर जीव गिरकर मिथ्यात्व को भी प्राप्त होता है और असंयम को भी प्राप्त होता है। इससे सिद्ध होता है कि देशावधि प्रतिपाती है । परमावधिज्ञान १. धवल पु. १३ पृ. ३२३ । २, धवल पु. १३ पृ, २६२ सूत्र ५४ व ५५। ३. धवल पु. १३ पृ. ३२७ गाथा १७ का पूर्वार्ध। ४. धवल पू. १३ पृ. ३२७। ५. "तत्थ मिच्छत पि गच्छेज्ज असंजमं पिगच्छेज्ज, प्रविरोहादो। "[धवल पु. १३ पृ. ३२३]
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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