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________________ गाथा ३७३ शानमार्गला/७३ अवधिज्ञान से भिन्न स्वरूप होने के कारण उनमें से किसी एक में उसका प्रवेश मानने में विरोध प्राता है। जो अवधिज्ञान उत्पन्न होकर बोवलज्ञान उत्पन्न होने पर विनष्ट होता है, अन्यथा विनष्ट नहीं होता, वह अप्रतिपासी अवधिज्ञान है। यह भी उन विशेष स्वरूप पहले के अवधिज्ञानों में अन्तर्भूत नहीं होता। क्योंकि यह सामान्य स्वरूप है।' यद्यपि प्रकृत गाथा में तथा तत्त्वार्थसूत्र में प्रतिपाती और अप्रतिपाती ये दो भेद नहीं कहे गये हैं तथापि छह भेदों से भिन्न ये दो भेद भी कहने योग्य हैं। इसीलिए धवल ग्रन्थ में इनका भी कथन पाया जाता है। अतः यहाँ भी प्ररूपरणीय जान कर उनका स्वरूपाख्यान किया है। इनका कथन षट् खण्डागम के मूल सूत्र ५६ में है । भवपच्चइगो प्रोही देसोही होदि परमसव्योही। मुगपच्चाइगो णियमा देसोही वि य गुरणे होदि ।।३७३।। गाथार्थ-भवप्रत्यय अत्रधिज्ञान देशावधि ही होता है। परमावधि और सर्वावधि नियम से गुण प्रत्यय ही होते हैं। देशावधि भी गुणप्रत्यय होता है ।।३७३॥ विशेषार्थ परमावधि ज्ञान में परम शब्द का अर्थ ज्येष्ठ है। परम ऐसा जो अवधि वह परमावधि है। ___ शङ्का-इस परमावधि ज्ञान के ज्येष्ठपना कैसे है ? समाधान—चूकि यह परमावधि ज्ञान देशावधि की अपेक्षा महाविषयवाला है, मनः पर्ययज्ञान के समान संयत मनुष्यों में ही उत्पन्न होता है, अपने उत्पन्न होनेवाले भव में ही केवलज्ञान की उत्पत्ति का कारण है और अप्रतिपाती है, इसलिए ज्येष्ठ है । परमावधि ज्ञान के उत्पन्न होने पर बह जीव न कभी मिथ्यात्व को प्राप्त होता है और न कभी असंयम को प्राप्त होता है। इसलिए उसका मरण सम्भव न होने से देवों में उत्पाद नहीं होता। सर्वावधि ज्ञान-विश्व और कृत्स्म ये 'सर्व' शब्द के समानार्थक शब्द हैं । सर्व है मर्यादा जिस जान को वह सर्वावधि है। यहाँ सर्व शब्द समस्त द्रव्य का बाचक नहीं है, क्योंकि जिसके परे अन्य द्रव्य न हो उसके अवधिपना नहीं बनता, किन्तु सर्व शब्द सबके एकदेशरूप रूपी द्रव्य में वर्तमान ग्रहण करना चाहिए। इसलिए सर्वरूपगत है अवधि जिसकी ; इस प्रकार सम्बन्ध करना चाहिए। अथवा जो पाचन और विसर्पणादि को प्राप्त हो वह पुद्गल द्रव्य सर्व है। वही जिसकी मर्यादा है वह सर्वावधि है।' यह सर्वावधिज्ञान भी चरमशरीरी संयत के होता है। अथवा 'सर्व' का अर्थ केवल ज्ञान है, उसका विषय जो-जो अर्थ होता है वह भी उपचार से सर्व कहलाता है। सर्व अवधि अर्थात मर्यादा जिस ज्ञान की होती है ( केवलज्ञान से ज्ञात अर्थ है मर्यादा जिसकी) वह सविधिज्ञान है। यह भी निर्ग्रन्थों के ही होता है । १. धवल पु. १३ पृ. २६४-२६५। २. धवल पु. पृ. ४१ । ३. घतल्ल पु. १३ पृ. ३२३ । ४. धवल पु. ६ पृ. ४७ । ५. धवल पू. १३ पृ. ३२३ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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