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________________ ज्ञानमार्गणा/४५७ विनयप्रकीर्णकविनय पाँच प्रकार का है - ज्ञानविनय, दर्शनविनय, चारित्रविनय, तपश्निय और औपचारिक विनय । जो पुरुष गुणों में अधिक हैं उनमें नम्रवृत्ति का रखना विनय है ।" भरत, ऐरावत व विदेह में साधने योग्य द्रव्य क्षेत्र-काल और भाव का आश्रय कर ज्ञानविनय, दर्शनविनय, वारिविनय, तपविनय, उपचार विनय इन पाँचों विनयों के लक्षरण, भेद और फल का कथन विनयप्रकीर्णक में है । गाथा ३६७-३६८ कृतिकर्मप्रकीर्णक-जिनदेव, सिद्ध, प्राचार्य और उपाध्याय की वन्दना करते समय जो क्रिया की जाती है, वह कृतिकर्म है । उस कृतिकर्म के आत्माधीन होकर किये गये तीन बार प्रदक्षिणा, तीन अवनति, चार नमस्कार और बारह प्रावर्त आदि रूप लक्षण, भेद तथा फल का वर्णन कृतिकर्म प्रकीर्णक करता है। यहाँ उपयुक्त गाथा है दुश्रोणदं जहाजावं वारसावत्तमेव वा । उसी तिसुद्ध च किवियम्मं पउजए || ६४॥ * है काय — यथाजात के सदम क्रोध आदि विकारों से रहित होकर दो अवनति, बारह प्रावर्त, चार शिरोनति और तीन शुद्धियों से संयुक्त कृतिकर्म का प्रयोग करना चाहिए ||६४ || दोनों हाथ जोड़कर सिर से भूमि स्पर्श रूप नमस्कार करने का नाम श्रवनति है । यह अवनति एक तो पंचनमस्कार की आदि में की जाती है और दूसरी चतुविशति की आदि में की के संयमन रूप शुभ योगों के बर्तने का नाम श्रावर्त है। पंचनमस्कार मंत्रोच्चारण के आदि व अन्त में तीन-तीन आवर्त तथा चतुविशतिस्तव के आदि व अन्त में तीन-तीन इस प्रकार बारह प्रावर्त किये जाते हैं । अथवा चारों दिशाओं में घूमते समय प्रत्येक दिशा में एक-एक प्रणाम किया जाता है, इस प्रकार तीन बार घूमने पर वे बारह होते हैं। दोनों हाथ जोड़कर सिर के नमाने का नाम शिरोनति है। यह क्रिया पंचनमस्कार और चतुर्विंशतिस्तव के आदि व अन्त में एक-एक बार करने से चार वार की जाती है । यह कृतिकर्म जन्मजात बालक के समान निर्विकार होकर मन बचन काय की पूर्व किया जाता है। 1 दशकालिक प्रकीर्णक - विशिष्ट काल विकाल है । उसमें जो विशेषता होती है वह वैकालिक है। वे वैकालिक दस हैं । उन दस वैकालिकों का दशवेकालिक नाम का अधिकार (प्रकीर्णक) है। यह् द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव का आश्रय कर आचारविषयक विधि व भिक्षाटन विधि की प्ररूपणा करता है । ७ उत्तराध्ययन प्रकीर्णक - जिसमें अनेक प्रकार के उत्तर पढ़ने को मिलते हैं, वह उत्तराध्ययन प्रकीर्णक 15 चार प्रकार के उपसर्गों (देवकृत, मनुष्यकृत, तिर्यंचकृत, अचेतनकृत) और बाईस परीषहों (क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, दंशमशक, नग्नता, श्ररति, स्त्री, चर्या, निषद्या, शय्या, श्राक्रोश, वध, याचना, अलाभ, रोग, तृणस्पर्श, मल, सत्कार पुरस्कार, प्रज्ञा, अज्ञान और श्रदर्शन ये बाईस परीषह ३. जयधवल १. " गुणाविषु नीति विनयः ।" [ जयघवल पु. १. ११७] । २. धवल पु. १. १८९ । पु. १ पृ. ११८ । ४. धवल पु. ६ पृ. १५६ । ५. मूलाचार ७/१०४ को टीका । ६. धवल पु. १ पृ. ६७ ७. धवल पु. ६. पं. १६०८ ८. धवन पु. १ पृ. है ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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