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________________ ४५०/गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ३६१-३६६ करने में समर्थ होता है उसे निकृतिवचन कहते हैं। जिस वचन को सुनकर तप और ज्ञान से अधिक गुणवाले पुरुषों में भी जीव नम्रीभूत नहीं होता है उसे अप्रणतिवचन कहते हैं। जिस वचन को सुनकर चौर्यकर्म में प्रवृत्ति होती है उसे मोषवचन कहते हैं। समीचीनमार्ग का उपदेश देनेवाले वचन को सम्यग्दर्शनवचन कहते हैं। मिथ्यामार्ग का उपदेश देने वाले वचन को मिथ्यावर्शन वचन कहते हैं। जिनमें वक्तृपर्याय प्रकट हो गई है ऐसे द्वीन्द्रिय से आदि लेकर सभी जीव वक्ता हैं। द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाम की अपेक्षा प्रसव अनेक प्रकार है। मूल पदार्थ के नहीं रहने पर भी सचेतन और अचेतन द्रव्य के व्यवहार के लिए जो संज्ञा की जाती है उसे नामसत्य कहते हैं। जैसे-ऐश्वर्यादि गुणों के न होने पर भी किसी का नाम 'इन्द्र' ऐसा रखना नामसत्य है। पदार्थ के नहीं होने पर भी रूप की मुख्यता से जो वचन कहे जाते हैं, उसे रूपसत्य कहते हैं। जैसे --चित्रलिखित पुरुष प्रादि में चैतन्य और उपयोगादिक रूप अर्थ के नहीं रहने पर भी 'पुरुष' इत्यादि कहना रूपसत्य है। मूल पदार्थ के नहीं रहने पर भी कार्य के लिए जो द्यतसम्बन्धी अक्ष (पासा) आदि में स्थापना की जाती है, उसे स्थापनासत्य कहते हैं। सादि और अनादि भावों की अपेक्षा जो वचन बोला जाता है उसे प्रतीत्यसत्य कहते हैं। लोक में जो वचन संवृति अर्थात् कल्पना के आश्रित बोले जाते हैं, उन्हें संवृतिसत्य कहते हैं। जैसे पृथिवी धादि अनेक कारणों के कहने पर भी जो पंक अर्थात् कीचड़ में उत्पन्न होता है उसे पंकज कहते हैं। धूप के सुगन्धित चूर्ण के अनुलेपन और प्रघर्षण के समय अथवा पम, मकर, हंस, सर्वतोभद्र और क्रौंच आदिरूप व्यूहरचना के समय सचेतन अथवा अचेतन द्रव्यों के विभागानुसार विधिपूर्वक रचनाविशेष के प्रकाशक जो वचन हैं उन्हें संयोजनासत्य कहते हैं। आर्य और अनार्य के भेद से बत्तीस देशों में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के प्राप्त करानेवाले वचन को जनपदसत्य कहते हैं। ग्राम, नगर, राजा, गण पाखण्ड, जाति और कुल आदि धर्मों के उपदेश करने वाले जो बचन हैं उन्हें देशसत्य कहते हैं। छद्मस्थों का ज्ञान यद्यपि द्रव्य की यथार्थता का निश्चय नहीं कर सकता है तो भी अपने गुण अर्थात् धर्म के पालन करने के लिए यह प्रासुक है, यह अप्रासुक है इत्यादि रूप से जो संयत और श्रावक के वचन हैं, उन्हें भावसस्य कहते हैं। प्रागभगम्य प्रतिनियत छह प्रकार की द्रव्य और उनकी पर्यायों को यथार्थता को प्रकट करने वाले जो वचन हैं उन्हें समयसत्य कहते हैं। प्रात्मप्रयादपूर्व सोलह वस्तुगत तीन सौ बीस प्राभूतों के छब्बीस करोड़ पदों द्वारा जीव वेत्ता है. विष्णु है, भोक्ता है, बुद्ध है इत्यादि रूप से आत्मा का वर्णन करता है। कहा भी है-- जीबो कत्ता य बत्ता य पाणी भोसाय पोग्गलो। वेदो विण्हू सयंमू य सरीरी तह मागवो ॥१॥ सत्ता अंतू य माणी य माई जोगी य संकडो। असंकडो य खेत्तण्ड अंतरप्पा तहेव य ॥२॥' .--जीव कर्ता है, वक्ता है, प्राणी है, भोक्ता है, पुद्गल है, वेद है, विष्णु है, स्वयम्भू है, गरीरी है, मानव है, सक्ता है, जन्तु है, भानी है, मायावी है, योगसहित है. संकुट है, असंकुट है, क्षेत्रज्ञ है और अन्तरात्मा है ।।८१-८२।। १. घ.. १ पृ. ११८-११६ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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