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________________ ज्ञानमा गंगा/ ४५१ जीता है, जीवित रहेगा और पहले जीवित था, इसलिए जीव है। शुभ और अशुभ कार्य करता है इसलिए कर्त्ता है। सत्य-असत्य और योग्य-अयोग्य वचन बोलता है, इसलिए वक्ता है । इसके प्राण पाये जाते हैं इसलिए प्राणी है । देव, मनुष्य, तिर्यच और नारकी के भेद से चार प्रकार के संसार में पुण्य और पाप का भोग करता है, इसलिए भोक्ता है। छह प्रकार के संस्थान और नाना प्रकार के शरीरों द्वारा पूर्ण करता है और गलाता है, इसलिए पुद्गल है। सुख और दुःख का बेदन करता है, इसलिए वेद है । अथवा जानता है, इसलिए वेद है। प्राप्त हुए शरीर को व्याप्त करता है इसलिए विष्णु है । स्वतः ही उत्पन्न हुआ है. इसलिए स्वयम्भू है । संसार अवस्था में इसके शरीर पाया जाता है, इसलिए शरीरी है। मनु ज्ञान को कहते हैं, उसमें यह उत्पन्न हुआ है, इसलिए मानव है । स्वजन सम्बन्धी मित्रवर्ग में आसक्त रहता है, इसलिए सकता है। चार गति रूप संसार में उत्पन्न होता है और दूसरों को उत्पन्न करता है, इसलिए जन्तु है । इसके मानकषाय पाई जाती है, इसलिए मानी है । इसके माया कषाय पाई जाती है, इसलिए मायी है। इसके तीन योग होते हैं, इसलिए योगी है। अतिसूक्ष्म देह मिलने से संकुचित होता है इसलिए संकुट है। सम्पूर्ण लोकाकाश को व्याप्त करता है, इसलिए असंकुट है । क्षेत्र अर्थात् अपने स्वरूप को जानता है, इसलिए क्षेत्रज्ञ है । आठ कर्मों के भीतर रहता है इसलिए अन्तरात्मा है । गाथा २६७ कर्मप्रवावपूर्व बीस वस्तुगत चार सौ प्राभृतों के एक करोड़ अस्सी लाख पदों द्वारा श्राउ प्रकार के कर्मों का वर्णन करता है। प्रत्याख्यानपूर्व तीस वस्तुगत छह सौ प्राभृतों के चौरासी लाख पदों हारा इव्य भाव आदि की अपेक्षा परिमितकालरूप और अपरिमितकालरूप प्रत्याख्यान, उपवासविधि, पाँच समिति और तीन गुप्तियों का वर्णन करता है । विद्यानुवादपूर्व पन्द्रह् वस्तुगत तीन सौ प्राभृतों के एक करोड़ दस लाख पदों द्वारा अंगुष्ठप्रसेना आदि सात सौ अल्प विद्याओं का, रोहिणी आदि पांच सी महाविद्याओं का और अन्तरिक्ष, भीम, अंग, स्वर, स्वप्न, लक्षण, व्यंजन, चिह्न इन आठ महानिमित्तों का वर्णन करता है। कल्याणवादपूर्व दस वस्तुगत दो सौ प्राभृतों के छब्बीस करोड़ पदों द्वारा सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र और तारागणों के चारक्षेत्र, उपपादस्थान, गति, वक्रगति तथा उनके फलों का, पक्षी के शब्दों का और अरिहन्त अर्थात् तीर्थंकर, बलदेव, वासुदेव और चक्रवर्ती आदि के गर्भावतार नादि महाकल्याणकों का वर्णन करता है। प्राखावायपूर्ण दस वस्तुगत दो सौ प्राभृतों के तेरह करोड़ पदों द्वारा शरीरचिकित्सा आदि अष्टांग आयुर्वेद, भूतिकर्म श्रर्थात् शरीर आदि की रक्षा के लिए किये गए भस्मलेपन, सूत्रबन्धनादि कर्म, जांगुलिप्रक्रम (विषविद्या) और प्राणायाम के भेदप्रभेदों का विस्तार से वर्णन करता है । क्रियाविशालपूर्व दसवस्तुगत दो सौ प्राभृतों के नौ करोड़ पदों द्वारा लेखनकला आदि बहत्तर कलाओं का स्त्रीसम्बन्धी चौंसठ गुग्गों का, शिल्पकला का, काव्यसम्बन्धी गुरदोषविधि का और छन्दनिर्माण कला का वर्णन करता है । लोकबिन्दुसारपूर्व दसवस्तुगत दो सौ प्राभृतों के बारह करोड़ पचास लाख पदों द्वारा आठ प्रकार के व्यवहारों का, चार प्रकार के बीजों का, मोक्ष को ले जाने वाली क्रिया का और मोक्षसुख का वर्णन करता है इन चौदह पूर्वो में सम्पूर्ण वस्तुनों का जोड़ एक सौ पच्चानवे है और सम्पूर्ण प्राभूतों का जोड़ तीन हजार नौ सौ है । श्रङ्गबाह्य श्रुत के भेद सामाइयचवीसत्थयं तदो बंदरगा पक्किम | वेणइयं किदियम्मं दसवेयालं च उत्तरायणं ।।३६७।।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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