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________________ ज्ञानमार्गणा / ४४६ प्रत्याख्यानपूर्व विद्यानुप्रवादपूर्व, कल्याणवादपूर्वं प्रारणावायपूर्व, क्रियाविशालपूर्व और लोकबिन्दुसार पूर्व गाथा ३६१-३६६ उनमें से, उत्पादपूर्व दसवस्तुगत दो सौ प्राभूतों के एक करोड़ पदों द्वारा जीव, काल और पुद्गल द्रव्य के उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य का वर्णन करता है । [ ग्रग्र अर्थात् द्वादशांगों में प्रधानभूत वस्तु के ययन अर्थात् ज्ञान को प्रग्रायण कहते हैं और उसका कथन करना जिसका प्रयोजन हो उसे प्राणीपूर्व कहते हैं ।] यह पूर्व चौदह वस्तुगत दो सौ अस्सी प्राभृतों के छ्यानवे लाख पदों द्वारा अंगों के अग्र अर्थात् परिमाण का कथन करता है । वीर्यानुप्रवादपूर्व प्राठ वस्तुगत एक सौ साठ प्राभृतों के सत्तर लाख पदों द्वारा आत्मवीर्य, परवीर्य, उभयवीर्य, क्षेत्रदीर्य, भाववीर्य और लपवीर्यं का वर्णन करता है । ग्रस्तिनास्तिप्रवादपूर्व अठारह वस्तुगत तीन सौ साठ प्राभृतों के साठ लाख पदों हारा जीव और सभी के नास्ति का वर्णन करता है। जैसे जीव, स्वद्रव्य, स्वक्षेत्र, स्वकाल और स्वभाव की अपेक्षा कथंचित् अस्तिरूप है । परद्रव्य, परक्षेत्र, परकाल और परभाव की अपेक्षा कथंचित् नास्तिरूप है। जिस समय वह स्वद्रव्यचतुष्टय और परद्रव्यचतुष्टय द्वारा अक्रम से युगपत् विवक्षित होता है, उस समय स्यादवक्तव्य रूप है। स्वद्रव्यादिरूप प्रथमधर्म और परद्रव्यादि रूप द्वितीयधर्म में जिस समय क्रमसे विवक्षित होता है, उस समय कथंचित् अस्ति नास्ति रूप है । स्यादस्तिरूप प्रथम धर्म और स्यादवक्तव्य रूप तृतीय धर्म से जिस समय विवक्षित होता है, उस समय कथंचित् अस्ति वक्तव्यरूप है । स्यान्नास्तिरूप द्वितीय धर्म और स्यादवक्तव्यरूप तृतीय धर्म से जिस समय क्रम से विवक्षित होता है उस समय कथंचित् नास्ति वक्तव्यरूप है । स्यादस्तिरूप प्रथम धर्म, स्यानास्तिरूप द्वितीय धर्म और स्यादवक्तव्यरूप तृतीय धर्म से जिस समय क्रम से विवक्षित होता है, उस समय कथंचित् ग्रस्ति नास्ति प्रवक्तव्यरूप जीव है। इसी तरह अजीवादिक का भी कथन करना चाहिए । ज्ञानप्रवादपूर्व बारह वस्तुगत दो सौ चालीस प्राभृतों के एक कम एक करोड़ पदों द्वारा पाँच ज्ञान तीन प्रज्ञानों का वर्णन करता है तथा द्रव्याथिकनय और पर्यायाथिकनय की अपेक्षा अनादिअनन्त, अनादि सान्त, सादि अनन्त और सादि सान्त रूप ज्ञानादि तथा इसी तरह ज्ञान और ज्ञान के स्वरूप का वर्णन करता है । सत्यप्रवादपूर्व बारह वस्तुगत दो सौ चालीस प्राभृतों के एक करोड़ छह पदों द्वारा वचनगुप्ति, वावसंस्कार के कारण, वचनप्रयोग, बारह प्रकार की भाषा, अनेक प्रकार के वक्ता, अनेक प्रकार के असत्यवचन और दस प्रकार के सत्यवचन इन सबका वर्णन करता है । असत्य नहीं बोलने को अथवा वचनसंयम अर्थात् मौन के धारण करने को वचनगुप्ति कहते हैं। मस्तक, कण्ठ, हृदय, जिह्वामूल, दांत, नासिका, तालु और औट ये आठ वचनसंस्कार के कारण हैं। शुभ और शुभ लक्षणरूप बचन प्रयोग का स्वरूप सरल है । अभ्याख्यानवचन, कलहवचन, पशून्यवचन, अवद्धप्रलापवचन, रतिवचन, अरतिवचन, उपधिवचन, निकृतिवचन, प्रतिवचन, मोषवचन, सम्यग्दर्शनवचन और मिथ्यादर्शन वचन के भेद से भाषा बारह प्रकार की है। यह इसका कर्ता है इस तरह अनिष्टकथन करने को श्रभ्याख्यानभाषा कहते हैं । परस्पर विरोध बढ़ाने वाले वचनों को कलवचन कहते हैं । पीछे से दोष प्रकट करने को पैशून्यवचन कहते हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के सम्बन्ध से रहित वचनों को प्रलापवचन कहते हैं । इन्द्रियों के शब्दादि विषयों में राग उत्पन्न करने वाले वचनों को रतिवचन कहते हैं। इनमें अरति उत्पन्न करने वाले वचनों को प्ररतिवचन कहते हैं। जिस वचन को सुनकर परिग्रह के अर्जन और रक्षण करने में आसक्ति उत्पन्न होती है, उसे उपधिवचन कहते हैं। जिस वचन को अवधारण करके जीव वाणिज्य में ठगने रूप प्रवृत्ति
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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