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________________ माथा ३५६-३६. ज्ञानमार्गणा/४३ समाधान--नहीं, क्योंकि पर्यायाथिकनय का अवलम्बन करने पर प्रदेशों के भी द्रव्यत्व की सिद्धि हो जाती है। प्रदेशकल्पना पर्यायाथिकनय की मुख्यता से होती है, इसलिए पर्यायाथिकनय का अवलम्बन करके प्रदेश में द्रव्य की सिद्धि हुई है।' जम्बूद्वीप, सर्वार्थ सिद्धि, अप्रतिष्ठान नरक और नन्दीश्वर द्वीपस्थ एक वापी, इनके समान रूप से एक लाख योजन विस्तार की अपेक्षा क्षेत्र समवाय होने से क्षेत्र-समवाय है । अथवा प्रथम नरक का पहला इन्द्रक सीमन्तक बिल, मनुष्यक्षेत्र, सौधर्मकल्प का पहला इन्द्रक ऋतुविमान और सिद्धलोक ये चारों क्षेत्र की अपेक्षा सण हैं, यह क्षेत्र समवाय है। समय, प्रावली, क्षण, लब, मुहूर्त, दिवस, पक्ष, मास, ऋतु, अयन, युग, पूर्व, पर्व, पाय, सागर, अबसपिणी, और उत्सपिणी ये परस्पर समान है। अर्थात् एक समय दुसरे समय के समान है. एक प्रावली दूसरी पावली के समान है। इसी तरह प्रागे भी समझना चाहिए। यह काल समवाय है। केवलज़ान केबलदर्शन के बराबर है यह भाव समवाय है।' व्याख्याप्रज्ञप्ति-यह दो लाख अट्ठाईस हजार पदों द्वारा क्या जीव है, क्या जीव नहीं है, जीव कहाँ उत्पन्न होता है और कहाँ से आता है, इत्यादिक साठ हजार प्रश्नों के उत्तरों का तथा छयानवे हजार छिन्नच्छेदों से ज्ञापनीय शुभ और अशुभ का वर्णन करता है । नाथ धर्म कथा अथवा जात धर्म कथा पांच लाख छप्पन हजार पदों द्वारा सूत्र पौरुषी अर्थात् सिद्धान्तोक्त विधि से स्वाध्याय के प्रस्थापन में भगवान तीर्थकर की तालु व अोष्ट पुट के हलन-चलन के बिना प्रवर्तमान समस्त भाषाओं स्वरूप दिव्य ध्वनि द्वारा दी गई धर्मदेशना की विधि का, संशययुक्त गणाधरदेव के संशय को नष्ट करने की विधि का तथा बहुत प्रकार कथा व उपकथानों के स्वरूप का कथन करता है। शङ्का-दिव्यध्वनि कैसी होती है ? समाधान-वह सर्वभाषामयी है, अक्षर-अनक्षरात्मक है, जिसमें अनन्तपदार्थ समाविष्ट हैं (अनन्त पदार्थों का वर्णन है), जिसका शारीर बीजपदों से घड़ा गया है, जो प्रात: मध्याह्न और सायंकाल इन तीन संध्याओं में छह-छह घड़ी तक निरन्तर खिरती रहती है और उक्त समय को छोड़कर इतर समय में गणधरदेव संशय, विपर्यय और अनध्यवसाय को प्राप्त होने उनके प्रवृत्ति करने (उनके संशयादि को दूर करने) का जिसका स्वभाव है, संकर और व्यतिकर दोषों से रहित होने के कारण जिसका स्वरूप विशद है और उन्नीस (अध्ययनों के द्वारा) धर्मकथानों का प्रतिपादन करना जिसका स्वभाव है। इस प्रकार स्वभाववाली दिव्यध्वनि समझनी चाहिए। उपासकाध्ययन ग्यारह लाख सत्तर हजार पदों के द्वारा ग्यारह प्रकार के श्रावक धर्म का निरूपण करता है। यहाँ उपयोगी माथा इस प्रकार है दसण-यब-सामाइय-पोसह-सच्चित्त रादिभत्ते य । बम्हारंभ - परिगगह-अणुमणमुद्दिट्ट देसविरदी य ॥७॥" १. जयधवल पु १ पृ. १२४ । २. चवल पु.६ पृ. १६६ । पृ. २०० व जयधवल पु. १ पृ. १२५ । ५. धवल पु. ७. धवल पु. १ पृ. १०२ व धवल पु. ६ पृ. २०१ । ३. 'जयषवल पु.१पृ. १२४-१२५। ४. पवल पू. पृ. २०० । ६. जयवबल पु. १ पृ. १२६ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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