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________________ ४४४/गो. सा. जीवकाण्ड गाथा ३५६-३६० दर्शनिक, अतिक, सामायिकी, प्रोषधोपवासी, सचित्तविरत, रात्रिभुक्तिविरत, ब्रह्मचारी, प्रारम्भविस्त, परिग्रहविरत, अनुमतिविरत और उद्दिष्टविरत इन ग्यारह प्रकार के श्रावकों के लक्षण, अत धारण करने की विधि और उनके आचरण का वर्गान करता है। अन्तकृशांग तेबीस लाख अट्ठाईस हजार पदों के द्वारा एक-एक तीर्थंकर के तीर्थ में नाना. प्रकार के दारुण उपसगों को सहन कर प्रातिहार्य (अतिशय विशेषों) को प्राप्त कर निर्वाण को प्राप्त हुए दस-दस अन्तकृतकेवलियों का वर्णन करता है। तस्वार्थभाष्य में भी कहा है -"जिन्होंने संसार का अन्त किया वे अन्तकृतकेवली हैं 1 श्री वर्द्धमान तीर्थकर के तीर्थ में नमि, मतंग, सोमिल, रामपुत्र, सुदर्शन, यमलीक, बलीक, किष्किबिल, पालम्ब, अष्टपुत्र ये दस अन्तकृत केवली हुए हैं। इसी प्रकार श्री ऋषभदेव आदि तेबीस तीर्थंकरों के तीर्थ में अन्य दस-दस अनगार दारुण उपसगों को जीत कर सम्पूर्ण कर्मों के क्षय से अन्तकृत केवली हुए। इस अंग में उन दस-दस का वर्णन किया जाता है अत एव वह अन्तकृद्दशांग कहलाता है ।" अनुत्तरौपपादिकवशांग नामक अंग में जागो लाख तीन हजार पनों हार' एक-एक तीर्थ में नाना प्रकार के दारुण उपसर्गों को सहकर और प्रतिहार्य प्राप्त करके पाँच अनुत्तर विमानों में गये हुए दस-दस अनुत्तरौपपादिकों का वर्णन करता है। तत्त्वार्थभाध्य में भी कहा है-उपपाद जन्म ही जिनका प्रयोजन है उन्हें प्रोपपादिक कहते हैं। विजय, वैजयन्त, जयन्त अपराजित और सर्वार्थ सिद्धि ये पाँच अनुत्तर विमान हैं। जो अनुत्तरों में उपपाद जन्म से पैदा होते हैं, वे अनुत्तरोपपादिक हैं। ऋषिदास, धन्य, सुनक्षत्र, कार्तिकेय, प्रानन्द, नन्दन, शालि भद्र, अभय, बारिषेरग और चिलातपुत्र ये दस अनुत्तरौपपादिक श्री वर्धमान तीर्थंकर के तीर्थ में हुए हैं। इसी तरह श्री ऋषभनाथ आदि तेवीस तीर्थंकरों के तीर्थ में अन्य दस-दस महा साधु दारुण उपसर्गों को जीतकर विजयादिक पाँच अनुत्तरों में उत्पन्न हुए। इस प्रकार अनुत्तरों में उत्पन्न होने वाले दस साधुनों का वर्णन जिसमें किया जाय वह अनुत्तरोपपादिक दशांग नाम का अंग है। प्रश्नव्याकरण नामका अंग तेरानवे लाख सोलह हजार पदों के द्वारा आक्षेपणी, विक्षेपणी, संवेदनी और निवेदनी इन चार कथानों का (तथा भूत, भविष्यत् और वर्तमान काल सम्बन्धी धनधान्य, लाभ-अलाभ, जीवित-मरण, जय और पराजय सम्बन्धी प्रश्नों के पूछने पर उनके उपाय का) वर्णन करता है। जो नाना प्रकार की एकान्त दृष्टियों का और दूसरे समयों का निराकरणपूर्वक शुद्धि करके छह द्रव्य और नौ प्रकार के पदार्थों का प्ररूपरग करती है, उसे श्राक्षेपसी कथा कहते हैं। जिसमें पहले परसमय के द्वारा स्वसमय में दोष बतलाये जाते हैं, अनन्तर परसमय की आधारभूत अनेक एकान्तदृष्टियों का शोधन करके स्वसमय की स्थापना की जाती है और छह द्रव्य नौ पदार्थों का प्ररूपण किया जाता है, उसे विक्षेपणो कथा कहते हैं। पुण्य के फल का कथन करने वाली कथा को संवेदनी कथा कहते हैं। शङ्का पुण्य के फल कौनसे हैं ? १. घवल पु. १ पृ. १०२, पु. १ पृ. २०१, जयधवल पु. १ पृ. १२६-१३०। २. श्रवल पु. १. १०२-१७३ व घवल पु. ६ पृ. २०१। ३. पवन पु. १ पृ. १२३.१०४, पु. ६ पृ. २०२, जयववस पु. १ पृ. १३ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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