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मार्गदर्शक :- आचार्य श्री सुविहिासागर जी महाराज
गाथा ३२३-३३१
जानमार्गा/४१३
संदृष्टि में यहाँ प्रक्षेप बारह (१२), पिशुल बासठ (६६) और पिशुलापिशुल दो सौ बीस (२२०) मात्र हैं। इसप्रकार स्थापित करके दुगुणी वृद्धि को प्ररूपणा करते हैं ।
शङ्का - उत्तृष्ट संख्यात के तीन चतुर्थ भाग ००००००००००००
(१६४१-१२) मात्र प्रक्षेप हैं। इनको पृथक स्था० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ०
पित करके फिर यहां उत्कृष्ट संन्यात के चतर्थ भाग ००००००००००
मात्र सकल प्रक्षेप यदि होते हैं तो दुगुनी वृद्धि का ००००००००
स्थान होता है परन्तु इतना है नहीं। अतएव यहाँ दुगुणी वृद्धि नहीं उत्पन्न होती है ?
समाधान - नहीं, क्योंकि पिशुलों की अपेक्षा उत्कृष्ट संख्यात के चतुर्थ भाग मात्र प्रक्षेप पाये जाते हैं । यथा- उत्कृष्ट संख्यात के तीन चतुर्थभाग मात्र
आगे जाकर स्थित संख्यात्तभागवृद्धिस्थान में उत्कृष्ट संख्यात के एक कम तीन चतुर्थ भाग के संकलन प्रमाण पिशुल हैं। एक को आदि लेकर एक अधिक क्रम से स्थित उनका समीकरण करने में प्रथम स्थान के एक पिशुल को ग्रहण कर अन्तिम पिशुलों में मिलाने पर उत्कृष्ट संख्यात के तीन चतुर्थ भाग मात्र पिंशुल होते हैं। द्वितीय स्थान में स्थित दो पिशुलों को ग्रहण वार दो कम द्विचरम पिशुलों में मिलाने पर यहाँ भी उत्कृष्ट संख्यात के तीन चतुर्थ भाग मात्र पिशुल होते हैं। तृतीय स्थान में स्थित ०००००००००००० वीन पिगुलों को ग्रहण कर तीन विचरम पिशुलों में ११०००००००००००० मिलाने पर उत्कृष्ट संन्यात के तीन चतुर्थ भाग २००० ० ० ० ० ० ० ० ० मात्र पिशुल होते हैं। इस प्रकार सबका समीकरण करने पर उत्कृष्ट संख्यात के तीन चतुर्थ भाग - ०० ० ००० ० ० ० ० ० ० प्रायत और एक कम तीन चतुर्थ भाग के अर्घभाग प्रमाण विस्तृत क्षेत्र होकर स्थित होता है । वह यह है ।
० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ०
फिर इसमें से उत्कृष्ट संख्यात के चतुर्थ भाग विष्कम्भ और उसके तीन चतुर्थ भाग आयाम के प्रमाण से छीलकर पृथक स्थापित करना चाहिए।
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४० ० ० ० ० ० ० ० ००० ०
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शेष क्षेत्र उत्कृष्ट संख्यात के ती लायत और उत्कृष्ट संख्यात के ही अर्धग्रंक से कम आठवें भाग विस्तृत क्षेत्र होकर स्थित होता है।
फिर इसके तीन खण्ड करके उनमें तृतीय खण्ड में से उत्कृष्ट संख्यान के पाटवें भाग मात्र पिशुलों को ग्रहण कर द्वितीय खण्ड की हीन पंक्ति में मिलाने पर प्रथम और द्वितीय खण्ड उत्कृष्ट संख्यात के चतुर्थभाग आयाम और उसके आठवें भाग विष्कम्भ से स्थित होते हैं। फिर उनमें से