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________________ ३६४/गो. मा. जीवकाण्ड गाथा ३१२-३१४ अप्रसिद्ध भी नहीं है, क्योंकि योग्य देश में स्थित पांचों अंगुलियों का एक साथ उपलम्भ पाया जाता है ।। एक अर्थ को विषय करनेवाला विज्ञान एकप्रत्यय है। शङ्का-ऊर्ध्वभाग, अधोभाग और मध्यभाग प्रादि रूप अवयवों में रहनेवाली अनेकता से अनुगत एकता पाई जाती है, अतएव वह एकप्रत्यय नहीं है ? समाधान -नहीं, क्योंकि यहाँ इस प्रकार की ही जात्यन्तरभूत एकता का प्रहण किया है।' एक शब्द के व्यवहार का कारणभूत प्रत्यय एकप्रत्यय है ।' शा-अनेकधर्मात्मक वस्तुओं के पाए जाने से एक अवग्रह नहीं होता है। यदि होता है तो एकधर्मात्मक वस्तु की सिद्धि प्राप्त होती है, क्योंकि एकधर्मात्मक वस्तु का ग्रहण करने वाला प्रमाण पाया जाता है ? समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि एक वस्तु का ग्रहण करनेवाला ज्ञान एक-अवग्रह काहलाता है। तथा विधि और प्रतिषेध धर्मों के वस्तुपना नहीं है, जिससे उनमें अनेक अवयह हो सके ? किन्तु विधि और प्रतिषेध धर्मों के समुदायात्मक एक वस्तु होती है उस प्रकार की वस्तु के उपलम्भ को एक अवग्रह कहते हैं। अनेक वस्तु विषयक ज्ञान को अनेक अवसह कहते हैं। किन्तु प्रतिभास तो सर्व ही अनेक धर्मों का विषय करनेवाला होता है, क्योंकि विधि और प्रतिषेध इन दोनों में किसी एक ही धर्म का अनुपलम्भ है, अर्थात् इन दोनों में से एक को छोड़कर दूसरा नहीं पाया जाता, दोनों ही प्रधान-अप्रधान रूपसे साथ-साथ पाये जाते हैं। विध का ग्रहण भेद प्रकट करने के लिए है, अत: बहुविध का अर्थ बहुत प्रकार है। जाति में रहनेवाली बहुसंख्या को अर्थात् अनेक जातियों को विषय करने वाला प्रत्यय बहुविध कहलाता है। गाय, मनुष्य, घोड़ा और हाथी प्रादि जातियों में रहने वाला अक्रम प्रत्यय चक्षुर्जन्य बहुविध प्रत्यय है। तत, बितत, घन और सुषिर आदि शब्दजातियों को विषय करने वाला अक्रम प्रत्यय श्रोत्रज बहुविध प्रत्यय है। कपूर, अगुरु, तुरुष्क (सुगन्धित द्रव्य विशेष) और चन्दन आदि सुगन्धित द्रव्यों में रहने वाला योगपद्य प्रत्यय | = ज्ञान] घ्राणज बहुविध प्रत्यय है। तिक्त, कषाय, प्राम्ल, मधुर और लवरग रसों में एक साथ रहने वाला प्रत्यय रसनज बहुविध प्रत्यय है। स्निग्ध, मृदु, कठिन, उष्म, गुरु, लघु और शीत आदि स्पों में एक साथ रहने वाला स्पर्शज बहुविध प्रत्यय है। यह प्रत्यय प्रसिद्ध नहीं है, क्योंकि यह पाया जाता है और जिसकी प्राप्ति है उसका अपह्नव नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा करने में अव्यवस्था की मापत्ति के साथ जातिविषयक बहप्रत्यय के निमित्त से होने वाले बहवचन के भी व्यवहार के प्रभाव की आपत्ति पाएगी। एक जाति को विषय करने के कारण इस बहुविध प्रत्यय के प्रतिपक्षभूत प्रत्यय [ = ज्ञान] को एकविध कहते हैं। १. धवल पृ. ६ पृ. १६ । २. धवल पु. १३ पृ. २३६ । ३. थवल पु. ६ पृ. १५१ । ४, पवल पु. ६ पृ. १६ । ५. धवल पु. ६ पृ. १५१-१५२ व धवल पु. १३ पृ. २३७ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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