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________________ गाथा ३१२.३१४ ज्ञानमार्गणा/३६५ शङ्का-एक और एकविध में क्या भेद है ? समाधान-एक व्यक्ति रूप पदार्थ का ग्रहण करना एक प्रवग्रह है और एक जाति में स्थित एक पदार्थ का अथवा बहुत पदार्थों का ग्रहण करना एकविध प्रवग्रह है।' अथवा एकविध का अन्तर्भाव एकप्रत्यय में नहीं होता , क्योंकि वह एक निगल एता में सम्बद्ध रहने वाला है और यह एकविध अनेक व्यक्तियों में सम्बद्ध एकजाति में रहने वाला है। जाति और व्यक्ति एक नहीं होने से उनको विषय करने वाले प्रत्यय भी एक नहीं हो सकते ।' शीन अर्थ को ग्रहण करने वाला प्रत्यय क्षिप्रप्रत्यय है । क्षिप्र वृत्ति अर्थात् शीघ्रवस्तु को ग्रहण करने वाला क्षिप्रप्रत्यय है । प्राशुग्रहण क्षिप्र-अवग्रह है । ६ धीरे (शनैः) ग्रहण करना अक्षिप्रअवग्रह है। जिस प्रकार नूतन सकोरे को प्राप्त हुआ जल उसे धीरे-धीरे गीला करता है, उसी प्रकार पदार्थ को धीरे-धीरे जानने वाला प्रत्यय अक्षिप्र-प्रत्यय है । वस्तु के एकदेश का अवलम्बन करके पूर्णरूप से वस्तु को ग्रहण करनेवाला तथा वस्तु के एकदेश अथवा समस्त बस्तु का अवलम्बन करके वहाँ अविद्यमान अन्य वस्तु को विषय करने वाला भी प्रनिःसृत प्रत्यय है। यह प्रत्यय प्रसिद्ध नहीं है, क्योंकि घट के अग्भिाग का अवलम्बन करके कहीं घट प्रत्यय की उत्पत्ति पायी जाती है, कहीं पर अर्वाग्भाग के एक देश का अवलम्बन करके उक्त प्रत्यय को उत्पत्ति पायी जाती है, कहीं पर गाय के समान गवय होता है। इस प्रकार अथवा अन्यप्रकार से एक वस्तु का अवलम्बन करके वहाँ समीप में न रहने वाली अन्य वस्तु को विषय करनेवाले प्रत्यय की उत्पत्ति पायी जाती है। कहीं पर अर्वाग्भाग के ग्रहण काल में ही परभाग का ग्रहण पाया जाता है और यह प्रसिद्ध भी नहीं है, क्योंकि अन्यथा वस्तुविषयक प्रत्यय की उत्पत्ति बन नहीं सकती। तथा अम्भिाव मात्र वस्तु हो नहीं सकती क्योंकि उतने मात्र से अर्थक्रियाकारित्व नहीं पाया जाता। शङ्का-अग्भिाग के पालम्बन से अनालम्बित परभागादिकों का होनेवाला ज्ञान अनुमान ज्ञान क्यों नहीं होगा? समाधान नहीं, क्योंकि अनुमान ज्ञान लिंग से भिन्न अर्थ को विषय करता है। अग्भिाग के ज्ञान के समान काल में होने वाला परभाग का ज्ञान तो अनुमान ज्ञान हो नहीं सकता, क्योंकि वह अवग्रह स्वरूप ज्ञान है । भिन्न काल में होने वाला भी उक्त ज्ञान अनुमान ज्ञान नहीं हो सकता, क्योंकि ईहा के बाद में उत्पन्न होने से उसका अवाय ज्ञान में अन्तर्भाव होता है। कहीं पर एक वर्ष के सुनने के समय में ही आगे कहे जाने वाले वर्णविषयक ज्ञान की उत्पत्ति उपलब्ध होती है, कहीं पर दो, तीन आदि स्पर्शवाली अतिशय अभ्यस्त वस्तु में एक स्पर्श का ग्रहण होते समय ही दूसरे स्पर्श से युक्त उस वस्तु का ग्रहण होता है। तथा कहीं पर एक रस के ग्रहणसमय में ही उस प्रदेश में असन्निहित दूसरे रस से युक्त वस्तु का ग्रहण होता है। इसलिए भी अनिःसृत प्रत्यय असिन्द नहीं है। दूसरे प्राचार्य 'अनिःसृत' के स्थान में 'निःसृत' पाठ पढ़ते हैं, परन्तु वह १. धवल पु, ६ पृ. ५० | २. धवल पु. पृ. १५२ । ३. धवल पु. १३ पृ. २३७ । ४. घवल पु. १३ पृ. २३७ । ५. बवल' पु.६ पृ. १५२ । ६. धवल पु.६ पृ. २०। ७. धवल पु. १३ पृ. २३७ बघवल पु. ६ पृ. १५२ व धवल पृ.६ पृ.२०। ८. घ.पु. ६ पृ. १५२-१५३ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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