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________________ ३६२/गो, सा. जीवकाण्ड गाथा ३१२-३१४ इस प्रकार कुल ८ विकल्प बने । इनके साथ मूल विकल्प .. ४, २४, २८, ३२ भी मिला देने पर कुल १२ विकल्प (भेद) हो जाते हैं । यथा:--४, २४, २८, ३२, २४,१४४, १६८, १६२, ४८, २८८, ३३६, ३८४ परन्तु इनमें २४ नामक संख्या दो बार आई। अतः एक ही प्रकार की संख्या दो बार पाजाने से इसे पुनरुक्त. मानकर एक चौबीस को अलग कर, एक बार ही चौबीस लिखने पर ऐसे भेद-समूह बनते हैं ४ २४ २८ ३२ १४४ १६८ १९२ ४८, २८५, ३३६, ३८४; इन्हें संख्या कम से जमाने पर ऐसा रूप बनता है ४, २४, २८, ३२, ४८, १४४, १६८, १६२, २८८, ३३६,३८४; स्मरणीय है कि २४, २४ जो दो बार पाए थे वे यद्यपि भिन्न-भिन्न प्रकार से बने थे। यथा पहली २४ भेद रूप संख्या:U६ इन्द्रिय ४४ अवग्रहादि भेद-२४" रूप हैं। दसरी २४ भेद रूप संख्या:-'अवग्रहादि ४४६/बह, बहुविध, क्षिप्रादि पदार्थ - २४ रूप है। फिर भी ये उस २४ रूप भेद के दो भंग हुए हैं। मूल स्थान तो २४ रूप एक ही हुआ; अतः एक बार ही चौबीस लिखा गया है । [ध.१३/२४१] अब इस प्रकार साधित ११ विकल्पों में से ऊपर मूल में ४, २४, २८, ४८, २८८, ३३६ इन' छह को ही खोला है। शेष विकल्प टिप्पण में खोल दिये ही हैं। के स्वरूप का कथन बहुपत्तिजाविगहणे बहुबहुविमियरमियरगहर, म्हि । सगरणामादो सिद्धा खिप्पादी सेवरा य तहा ।।३१२॥ वत्थुस्स पदेसादो वत्थुग्गहरणं तु वत्थुदेसं वा । सकलं वा अवलंबिय अरिगस्तिदं अण्णवत्थुगई ॥३१३॥ पुक्खरगहणे काले हथिस्स य बदरगगवयगहरणे वा। वत्थंतर-चंदस्स य घेणुस्स य बोहणं च हवे ॥३१४॥ गाथार्थ-एक जाति के बहुत व्यक्ति 'बह' है। इससे विपरीत अर्थात् बहू जाति के बहुत व्यक्तिः 'बहुविध' हैं। इनके प्रतिपक्षी तथा क्षिप्रादि र उनके प्रतिपक्षियों का उनके नाम से ही अर्थ सिद्ध है ॥३१२।। वस्तु के एकदेश को देखकर समस्त वस्तु का ज्ञान होना अथवा वस्तु के एकादेश या पूर्ण वस्तु का ग्रहण होने पर उसके अवलम्बन से अन्य वस्तु का ज्ञान होना यह सब अनिःसृत है ।।३१३।। जल में डबे हए हस्ती की सूड को देखकर उसो समय हस्ती का ज्ञान होना देखकर उसी समय उससे भिन्न किन्तु उसके सदृश चन्द्रमा का ज्ञान होना अथवा गवय को देखकर गौ | ज्ञान हाना, यह सब प्रनिःमृत ज्ञान है ।।३१४॥ विशेषार्थ-'बहु' शब्द को संख्यावाची और वैपुल्यवाची ग्रहण किया है, क्योंकि दोनों प्रकार का अर्थ करने में कोई विशेषता नहीं है। बहुशब्द संख्यावाची है और वैपुल्यवाची भी है । उन दोनों का ही यहाँ ग्रहण है, क्योंकि इन दोनों ही अर्थों में समानरूप से उसका प्रयोग होता है। संख्या में
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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