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________________ गाथा ३१०-३११ ज्ञानमार्गणा/३६१ का:-- वक्ष से बहुत कामबाह करता है, चक्ष से एक का अवग्रह करता है, इत्यादि । इस प्रकार चारिन्द्रिय अवग्रह बारह प्रकार है। ईहा, अवाय और धारणा इनमें से प्रत्येक चक्षु के निमित्त से बारह प्रकार है। इस प्रकार चक्षु इन्द्रिय के निमित्त से मतिज्ञान के अड़तालीस भेद होते हैं। मन के निमित्त से भी इतने ही भेद होते हैं, क्योंकि इन दोनों के व्यंजनावग्रह नहीं होता । शेष चार इन्द्रियों में से प्रत्येक के निमित्त से साठ भंग होते हैं, क्योंकि उनमें व्यंजनावग्रह के बारह भेद भी होते हैं ।ये सब एकत्र होकर (४८ + ४८ + ६०+६०+६०.६.) तीन सौ छत्तीस होते हैं।' अथवा इस प्रकार से भी स्पष्टीकरण किया जा सकता है- अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा के भेद से पाभिनिवोधिक ज्ञान चार प्रकार का है। एक इन्द्रिय के यदि अवग्रह आदि चार ज्ञान प्राप्त होते हैं तो छह इन्द्रियों के कितने ज्ञान प्राप्त होंगे? इस प्रकार राशिक प्रक्रिया द्वारा फलराशि से गुणित इच्छाराशि को प्रमाण राशि से भाजित करने पर चौबीस प्राभिनिबोधिक ज्ञान उपलब्ध होते हैं। इन चौबीस भेदों में जिह्वा, स्पर्शन, घ्राण और श्रोत्र इन्द्रिय सम्बन्धी चार व्यंजनावग्रहों के मिलाने पर आभिनिबोधिक ज्ञान के अट्ठाईस भेद होते हैं । बहु, बहुविध, क्षिप्र, अनिःसृत, अनुक्त और ध्रव तथा इनके प्रतिपक्षभूत पदार्थों का आभिनिबोधिक ज्ञान होता है। चक्षु के द्वारा बहुत का अवग्रहज्ञान होता है, चक्षु के द्वारा एक का अवग्रहज्ञान होता है इत्यादि चक्षु-अवग्रहज्ञान के बारह भेद हो जाते हैं। इसी प्रकार चक्षु, ईहा, अवाय और धारणा के भी बारह-बारह भेद हो जाते हैं। पहले उत्पन्न किये गये ४, २४, २८ भेदों को दो स्थानों में रखकर छह और बारह से गुणा करके और पुनरुक्त भंगों को कम करके क्रम से स्थापित करने पर इन भेदों का प्रमाण होता है ४४१२= ४८ २४-१२-२८८, २८४१२-३३६ । इनमें प्रवग्रह आदि की अपेक्षा ४८ भेद, इन्द्रिय व मन के अर्थावग्रह प्रादि की अपेक्षा २८८ भेद तथा व्यंजनावग्रह के ४८ भेद मिलाने पर (२५८+ ४८) कुल ३३६ भेद हो जाते हैं। बात यह है कि मूल में अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये ४ भेद हैं । इन्हें ५ इन्द्रिय और एक मन (६)से गुरिंगत कर देने पर २४ भेद होते हैं। इसमें व्यंजनावग्रह के ४ भेद मिला देने पर २८ भेद हो जाते हैं। ये अट्ठाईस उत्तरभेद हैं, अत: इनमें अवग्रह आदि ४ मूल भेद मिला देने पर ३२ भेद हो जाते हैं। [धवल १३/२३४] ये भेद तो इन्द्रिय और अवग्रहादि की अलगअलग विवक्षा से हुए। अब जो बहु, बहुविध, क्षिप्र, अनिःसृत, अनुक्त व ध्रुव : ऐसे ६ प्रकार के पदार्थ बताये हैं तथा इनके प्रतिपक्षभूत ६ इतर पदार्थों को मिलाकर [यानी एक, एकविध आदि को मिलाकर] १२ प्रकार के पदार्थ बताये हैं। उनसे अलग-अलग उक्त |४, २८, २८ व ३२] विकल्पों को यदि मुरिगत किया जाता है तो मतिज्ञान के निम्न विकल्प उत्पन्न होते हैं: .. प्रथम स्थान ४-६- २४ २४४६= १४४ द्वितीय स्थान ४-१२-४८ २४४१२=२८८ ३२४६=१६२ ३२४.१२=३०४ .१.भ.पु. ६ पृ. १५५-१५६ व ध.पु. ६ पृ. १६-२१1 २. व.पु. १३ पृ. २३३-२४० ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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