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________________ ३८२/गो. सा. जीवकाण्ड माथा ३०७-३०० ग्रन्यकार प्रागे कहेंगे, इसलिए यहाँ पर इनका स्वरूप नहीं लिखा गया है । अवग्रह ब ईहा का लक्षण तथा प्रवग्रह के भेद विसपारणं विसईरणं संजोयाणंतरं हवे रिणयमा । अवगहरणाणं गहिवे विसेसकंखा हवे ईहा ॥३०७।। बेंजणप्रत्यायग्गहभेदा हु हवंति पत्तपत्तस्थे । कमसो ते वावरिदा पढम ए हि चक्खुमणसाणं ॥३०॥' गाथार्थ-विषय और विषयी के संयोग के अनन्तर नियम से अवग्रह ज्ञान होता है। ग्रहण किये गये पदार्थ की विशेष जिज्ञासा ईहा ज्ञान है ॥३०७॥ प्राप्त अर्थ और अप्राप्त अर्थ के कारण क्रम से व्यंजनावग्रह और अविग्रह के भेद से अवग्रह दो प्रकार का हो जाता है। उत्पत्ति क्रम की अपेक्षा पहले व्यंजनावग्रह तशा पीछे अर्थावग्रह इस ऋम से होते हैं। चक्षु और मन से व्यंजनावग्रह नहीं होता ॥३०८।। विशेषार्थ-विषय और विषयी के सम्बन्ध होने के अनन्तर जो प्रथम ग्रहण होता है वह अवग्रह ज्ञान होता है । अवग्रह से ग्रहण किये गये पदार्थ के विशेष को जानने के लिए अभिलाषारूप जो ज्ञान होता है वह ईहा है। विषय और विषयी के सम्बन्ध के अनन्तर जो आद्य ग्रहण होता है वह अवग्रह है। 'पुरुष' इस प्रकार अवग्रह द्वारा गृहीत अर्थ में भाषा, आयु और रूपादि विशेषों से होने वाली पाकांक्षा का नाम ईहा है। विषय और विषयी का सम्पात होने के अनन्तर जो प्रथम ग्रहण होता है, वह अवग्रह है। रस प्रादिक अर्थ विषय है, छहों इन्द्रियाँ विषयी हैं। ज्ञानोत्पत्ति की पूर्वावस्था ही विषय व विषयी का सम्पात है, जो दर्शन है । यह दर्शन ज्ञानोत्पत्ति के कारण-भूत परिणाम-विशेष की सन्तति की उत्पत्ति से उपलक्षित होकर अन्तमुहूर्त काल स्थायी होता है। इसके बाद जो वस्तु का प्रथम ग्रहण होता है वह अवग्रह है। यथा - चक्षु के द्वारा 'यह घट है, यह पट है ऐसा ज्ञान होना अवग्रह है। जहाँ घटादि के बिना रूप, दिशा और आकार आदि विशिष्ट बस्तुभात्र ज्ञान के द्वारा अनध्यबसायरूप से जानी जाती है यहाँ भी अवग्रह ही है, क्योंकि अनवगहीत अर्थ में ईहादि ज्ञानों की उत्पत्ति नहीं हो सकती। इसी तरह शेष इन्द्रियों का भी अवग्रह वहना चाहिए। विषय और विषयी के योग्य देश में प्राप्त होने के अनन्तर आद्यग्रहण अवग्रह है। बाहरी पदार्थ विषय है और न्द्रयां विषयी हैं। इन दोनों की ज्ञान उत्पन्न करने के योग्य अवस्था का नाम संपात है। विषय और विषयी के संपात के अनन्तर रत्पन्न होने वाला ज्ञान अवग्रह कहलाता है। वह अवग्रह भी दो प्रकार का है.- अर्थावग्रह और व्यंजनावग्रह। उनमें अप्राप्त अर्थ का ग्रहण अर्थावग्रह है, जैसे चक्षरिन्द्रिय के द्वारा रूप को ग्रहण करना। प्राप्त अर्थ का ग्रहण व्यंजनावग्रह है, जैसे स्पर्शनेन्द्रिय के द्वारा स्पर्श को ग्रहण करना । -- ....-.- .- -.. १. मुद्रित ग्रन्थों में गाथा ३०८ का नं. गाथा ३०५ है और गाथा ३०७ का नं. गाथा ३०८ | किन्तु यहाँ पर जिस गाथा में प्रवग्रह ज्ञान का लक्षगा कहा गया है वह प्रथम लिखी गई है, उसके पश्चात् अवग्रह ज्ञान के भेद बाली गाथा लिम्दी गई है। २. धवल १ ११. ३५४ । ३. धवल पु. ६. १४४ । ४. धवल पु. १३ पृ. २१६-२१७ । ५. धवल पु. ६ पृ. १६ पृ. १७।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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