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________________ ३६२/गो. सा. जीवकाण्ड गाथा २०४-२८७ प्रतिच्छेद अनन्तगणे हैं । इस स्थान के प्राप्त होने तक लेजाना चाहिए। इस प्रकार उत्तरोत्तर अनुभाग व्यवस्था के अनुसार यह क्रम निश्चित होता है कि लता के समान समस्त अनुभागअविभागप्रतिच्छेदों से दारु के समान समस्त अनुभाग के अविभागप्रतिच्छेद अनन्तगुग्गे हैं। इसी प्रकार दारु के समान अनुभाग से अरिथ के समान अनुभाग अनन्तगुणे हैं। उससे भी शैल के समान अनुभाग अनन्तगृणे हैं।' ___ कषायों की चालीस कोड़ाकोली सागरोपम स्थितिबन्ध करने वाले जीव के अन्तिम स्थिति में एकस्थानीय, स्थानीय, स्थानीय और चतु:स्थानीय विशेषता को लिये हुए देशघाती और सर्वधाती सब प्रकार के परमाणु पाये जाते हैं। तथा प्राबाधा के बाद की समनन्तर जघन्य स्थिति में भी वे अविशेष रूप से सम्भव हैं 1 एकस्थानीय अनुभाग उत्कृष्टस्थिति में भी प्राप्त होता है और चतुः स्थानीय अनुभाग जघन्य स्थिति में भी प्राप्त होता है, क्योंकि सभी स्थितिविशेषों में अपने-अपने चारों स्थान बिना विशेषता के पाये ज.ते हैं।' सन्वावरणीयं पुण उपकरसं होई दारु असमाने । हेवा देसावरणं सवावरणं च उवरिल्लं ॥७६।। --दारु के समान मान में प्रारम्भ के एकभाग अनुभाग को छोड़कर शेष सब अनन्तबहुभाग तथा उत्कृष्ट अनुभाग सर्वावरणीय हैं (सर्वघाती हैं) । उससे पूर्व का लता समान अनुभाग और दार का प्रथम अनन्तवें भाग अनुभाग देशावरण है। दारु समान अनुभाग से आगे का अस्थि व शैल रूप अनुभाग सर्वावरण (सर्वघाती) है । यह क्रम माया, लोभ व क्रोध सम्बन्धी चारों स्थानों में मिरवशेष रूप से नियम से जानना चाहिए। असेजी जीव द्विस्थानीय अनुभाग का वेदन करता हुआ नियम से द्विस्थानीय अनुभाग को बांधता है, क्योंकि उनमें प्रकारान्तर सम्भव नहीं है । संज्ञी पंवेन्द्रिय जीव (श्रेणी में) एकस्थानीय अनुभाग का वेदन करता हुआ नियम से एकस्थानीय अनुभाग को ही बाँधता है शेष अनुभागों को नहीं बाँधता । द्विस्थानीय अनुभाग का वेदन करता हुआ द्विस्थानीय, त्रिस्थानीय और चतु:स्थानीय अनुभाग को बाँधता है । त्रिस्थानीय अनुभाग का वेदन करता हुन्या विस्थानीय और चतु:स्थानीय अनुभाग को बाँधता है । तथा चतुःस्थानीय अनुभाग का वेदन करता हुआ नियम से चतु:स्थानीय अनुभाग को बांधता है । वह शेष स्थानों का प्रबन्धक है ।। ऋोधकषाय के चारों स्थानों नग, पृथ्वी आदि का उदाहरणपूर्वक जो अर्थसाधन किया गया है बह कल विषयक साधर्म्य का प्राश्रय लेकर किया गया है। शेष कषायों के बारह स्थानों का भाब की मुख्यता से उदाहरणपूर्वक अर्थसाधन किया गया है। मान का भाव स्तब्धता है। माया का भाव अनर्जुगल वक्रता है । लोभ का भाव असन्तोषजनित संबलेशपना है। जो जीत्र (श्रेणी में) अन्तर्मुहूर्त तक होने वाले भाब को धारण कर क्रोध का वेदन करता है, वह उदकराजि के समान ही क्रोध का बेदन करता है, क्योंकि उदकराजि के समान उसका १. जयघवल पु. १२ पृ. १६२-१६३ । २. जयघवल पु. १२ पु. १५८ । ३. जयधवल पु. १२ पृ. १६४ ॥ ४ जयधवल पु. १२ पृ. १६५ ५. जयधवल पु. १२ पृ. १७१ । ६. जयधवल पु. १२ पृ. १७९-१८० ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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