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________________ गाथा २८८-२८७ कपायमागंगा/३६१ करना शक्य है । तथा गोमूत्र सदृश और अवलेखनी या खुरपा के सदृश माया के क्रम से वऋभाव की हानि के तारतम्य के सम्बन्ध से कथन करना चाहिए। यहाँ पर अबलेखनी पद से दांतों को साफ करने वाला लकड़ी का टुकड़ा (दातुन या जीभी) लेना चाहिए।' लोभ का प्रथम स्थान कृमिराग लोभस्थान है। कृमिराग कीट विशेष होता है। वह नियम से जिस वर्ण के आहार को ग्रहण करता है, उसी वर्ण के अतिचिक्का डोरे को अपने मल त्यागने के द्वार से निकालता है। उस सूत्र द्वारा जुलाहे अतिकीमती अनेक वर्णवाले नाना वस्त्र बनाते हैं उस वर्ण के रंग को यद्यपि हजार कलशों की सतत धारा द्वारा प्रक्षालित किया जाता है, नाना प्रकार के क्षारयुक्त जलों द्वारा धोया जाता है तो भी उस रंग को थोड़ा भी दूर करना शक्य नहीं है, क्योंकि वह प्रतिनिकाचितस्वरूप है, अग्नि से जलाये जाने पर भी भस्मपने को प्राप्त होते हुए उस कृमिराग से अनुरक्त हुए वस्त्र के उस वर्ण का रंग कभी छुटने योग्य न होने से वैसा ही बना रहता है । इसी प्रकार जीव के हृदय में स्थित अतितीव लोभ परिणाम जिसे कृश नहीं किया जा सकता, वह ऋभिराग के रंग के सदृश कहा जाता है।' अन्यद्धि (दूसरा) लोभ निकृष्ट वीर्यवाला और तीव्र अवस्था परिणत होता है । वह अक्षमल सदृश होता है। रथ के चक्के को या गाड़ी के तुम्ब को धारण करने वाली लकड़ो प्रक्ष कहलाती है और उसका मल अक्षमल है । अर्थात् अक्षांजन के स्नेह से गीला हुअा मषीमल । अति चिक्कण होने से उस अक्षमल को सुखपूर्वक दूर करना शक्य नहीं है, उसी प्रकार यह लोभ परिणाम भी निघत्त स्वरूप होने से जीव के हृदय में अबगाढ़ होता है। इसलिए उसे दूर करना शक्य नहीं है।' तीसरा लोभस्थान धूलि लेप के सदृश है। जिस प्रकार पर में लगा हुआ धूलि का लेप पानी के द्वारा घोने आदि उपायों द्वारा सुखपूर्वक दूर कर दिया जाता है, वह चिरकाल तक नहीं ठहरता, उसी के समान उत्तरोत्तर भन्द स्वभाव वाला यह लोभ का भेद भी चिरकाल तक नहीं ठहरता । पिछले लोभ से अनन्तगुणाहीन सामर्थ्यवाला होता हुआ थोड़े ही काल में जरा से प्रयत्न द्वारा दूर हो जाता है । जो लोभ की चौथी मन्दतर अवस्था विशेष है, वह हरिद्रवस्त्र के समान कही गयी है। हल्दी से रंगा वस्त्र हारिद्र कहलाता है । जैसे हल्दी के द्रव से रंगे गये वस्त्र का वर्ण रंग चिरकाल तक नहीं ठहरता, वायु और आतप आदि के निमित्त से ही उड़ जाता है। इसी प्रकार यह लोभ का भेद मन्दतम अनुभाग से परिणत होने के कारण चिरकाल तक आत्मा में नहीं ठहरता। क्षण मात्र में ही दूर हो जाता है। इस प्रकार प्रकर्ष और अप्रकर्ष वाले तीव्र और मन्द अवस्था के भेद से विभक्त होने के कारण लोभ भी चार प्रकार का कहा गया है। अल्पबद्धत्व इस प्रकार है--लता के समान जघन्य वर्गणा के अविभागप्रतिच्छेदों से दारु के समान जघन्यवर्गणा के अविभागप्रतिच्छेद अनन्तगुणे हैं । लता के समान दूसरी वर्गणा के अविभागप्रतिच्छेदों से दारू के समान दूसरी वर्गणा के अविभागप्रतिच्छेद अनन्तगुणे हैं। इस प्रकार लता के समान उत्कृष्टवर्गणा के अविभागप्रतिच्छदों से दारु के समान उत्कृष्टवर्गणा के अविभाग ३. जयश्वल पु. १२ पृ. १५६ । १. जयधवल पु. १२ पृ. १५५। २. जयधवल पु. १२ पृ. १५६। ४. जयश्रवल पू. १२ पृ. १५६-१५७ । ५. जयधवल पु. १२ पृ. १५७ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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