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________________ ३४८ / गो. सा. जीवकाण्ड यद्यपि निवृत्तिकरण के अवेदभाग के प्रारम्भ से जीव श्रपगतवेदी हो जाता है तथापि यहाँ पर उसकी त्रिवक्षा नहीं है, किन्तु केवली की विवक्षा है। क्योंकि स्वात्मोत्पन्न श्रनन्त उत्कृष्ट सुख केवली के ही सम्भव है ।' छद्मस्थ अवस्था में ज्ञान दर्शन स्वभाव का घात होने से स्वाभाविक अनन्त व उत्कृष्ट सुख सम्भव नहीं है, किन्तु स्वभाव का घात रूपी दुःख विद्यमान है । गावा २७७-२७८ वेदमाता में जीवसंख्या जोइ सिवा रणजोरिंग रितिरिवखपुरुसा य सगिरो जीवा । तसे पम्मलेस्सा गु गाथार्थ - ज्योतिष देवों से संख्यातगुणे हीन व्यन्तर हैं। उनसे संख्यातगुगो हीन योनिनी तिर्यंच हैं। उनसे संख्यातगुणे हीन पुरुषवेदी तिर्यच हैं। उनसे संख्यातगुणे हीन संज्ञी पंचेन्द्रियतिर्यंच हैं। उनसे संख्यातगुणे हीन संजी पंचेन्द्रिय तेजोलेश्या वाले जीव हैं। उनसे संख्यातगुणे हीन संशी पंचेन्द्रिय पद्मलेश्मा वाले जीव हैं ॥ २७७॥ कमेरदे ।।२७७ ।। विशेषार्थ – पंचेन्द्रिय तिर्यंच योनिनी जीव भवनवासी देवियों से संख्यातगुण हैं । वानव्यन्तर देव पंचेन्द्रिय तिर्यच योनिनियों से संख्यातगुणे हैं। वहीं पर देवियाँ देवों से संख्यातगुणी हैं । ज्योतिषी देव बानव्यंतर देवियों से संख्यातगुणे हैं । तथा वहीं पर देवियों देवों से संख्यातगुणी हैं। यह ख़ुद्दाबन्ध के सूत्र से जाना जाता है। देवों के संख्यात बहुभाग देवियाँ होती हैं तथा तिथंच योनिनी जीव देवियों के संख्यातवें भाग हैं । 3 इगिपुरिसे बसीसं देवी तज्जोगभजिददेवोधे । सगगुलगारेण गुणे पुरुषा महिला य देवेसु || २७८ ॥ गाथार्थ - एक देव के बत्तीस देवियां होती हैं। उनके योग से देवघोष राशि को भाग देकर ने-अपने गुणाकार से गुणा करने पर देव और देवियों का प्रमाण प्राप्त होता है ।। २७८ ॥ विशेषार्थ - यदि एक देव है तो उसकी बत्तीस देवियाँ होती हैं । इस प्रकार एक और बत्तीस को जोड़कर (१+ ३२) तैंतीस से देवराशि को खण्डित करने पर एक खण्डं प्रमाण देव हैं इस एक खण्ड को देव प्रोघ राशि में से कम करने पर देवियों का प्रमाण प्राप्त होता है । " देवों से देवियाँ बत्तीस गुणी होती हैं, ऐसा व्याख्यान भी देखा जाता है ।" देवों से देवियाँ बत्तीस गुग्गी हैं, इस प्रकार आचार्य परम्परा से आये हुए उपदेश से जाना १. श्रीमंदभयचन्द्र सूरि सिद्धान्तचक्रवर्ती कृत टीका । २. प्रवचनसार गा. ६० श्री श्रमुतचन्द्राचार्य कृत टीका "खेदस्यायतनानि घातिकर्माणि ।" तथा गा. ५५ श्री जयसेन श्राचार्य कृत टीका- "यावतांशेन सूक्ष्मार्थं न जानाति तावतांशेन चित्खेदकारणं भवति । खेदश्च दुःखम् ।” २. व. पु. ३ पृ. ४९३-४१४ । ४. "देवरास तेत्तीमखंडारिण काणेगखंडमवदेि देवी पमाणं होदि ।" [ ष. पु. ७ पृ. २८१] । ५. देवहितो देवी बताओ ति वस्त्रासारखादोस ।" [ ध.पु. ३ पृ. २३२] ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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