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गाथा २७१
वेदमार्गणा/३४७ दोनों प्रकार की अभिलाषा पाई जाती है, उसे नपुसक कहते हैं ।' अथवा नपुसक वेद नोकषाय के उदय से जो प्रात्मपरिणाम होते हैं वह नपुंसकवेद है। जिसके दाढ़ी, मूछ व लिंग इत्यादि पुरुष के चिह्न तथा स्तन, योनि इत्यादि स्त्री के चिह्न ये दोनों चित नहीं पाये जाते. वह नपुसक है ।
वेदरहित जीव तिरणकारिसिट्टपागग्गिसरिसपरिणामयणम्मुक्का ।
अवगयत्रेवा जीवा सगसंभवरांतवरसोक्खा ॥२७६॥ गाथार्थ-तृण की अग्नि, कारीष-अग्नि, इष्टपाक अग्नि (आवा की अग्नि) के समान तीनों वेदों के परिणामों से रहित जीव अपगतवेदी होता है। ऐसे जीव आत्मासे उत्पन्न होने वाले अनन्त और सर्वोत्कृष्ट सुख को भोगते हैं ।।२७६।।।
विशेषार्थ-जिनके तीनों प्रकार के वेदों से उत्पन्न होने वाला सन्ताप (अन्तरंग दाह) दूर होगया है, व अपगतबेदो जोव है। प्रौपशमिक व क्षायिक लब्धि से जोब अपगतवेदी होता है। विवक्षित वेद के उदय सहित उपशम श्रेणी चढ़ कर मोहनीयकर्म का अन्तर करके, यथायोग्य स्थानों में विवक्षित वेद के उदय, उदीरणा, अपकर्षण, उत्कर्षण, परप्रकृतिसंक्रम, स्थितिकाण्डक, और अनुभाग काण्डक के बिना जीव में जो पुद्गल स्कन्धों का अवस्थान होता है, वह उपशम है । उस समय जो जीव की बेद के अभाव रूप लब्धि है, उसीसे जीव अपगतवेदी होता है।
विवक्षित वेद के उदय से क्षपक श्रेणी को चढ़ कर, अन्तरकरण करके यथायोग्य स्थान में विवक्षित वेद सम्बन्धी पुद्गल स्कन्धों के स्थिति व अनुभाग सहित जीवप्रदेशों से नि:शेषतः दूर हो जाने को क्षय कहते हैं। उस अवस्था में जो जीव का परिणाम होना है वह क्षायिक भाव है। उस क्षायिक लब्धि से जीव अपगतवेदी होता है ।
शङ्का—वेद का प्रभाव और प्रभाव सम्बन्धी लब्धि ये दोनों जब एक ही काल में उत्पन्न होते हैं, तब उनमें प्राधार-प्राधेय भाव या कार्यकारण भाव कैसे बन सकता है ?
समाधान-बन सकता है, क्योंकि समान काल में उत्पन्न होने वाले छाया और अंकुर में कार्य-कारण भाव देखा जाता है तथा घट की उत्पत्ति के काल में ही कुशूल का प्रभाव देखा जाता है।
शा-तीनों वेदों के द्रव्य कर्मों के क्षय से भाववेद का अभाव भले ही हो, क्योंकि कारण के प्रभाव से कार्य का अभाव मानना न्यायसंगत है। किन्तु उपशमधेणी में त्रिवेदसम्बन्धी पुद्गल द्रव्यस्कन्धों के रहते हुए भाववेद का प्रभाव घटित नहीं होता, क्योंकि कारण के सद्भाव में कार्य का प्रभाव मानने में विरोध प्राता है ?
समाधान-विरोध नहीं आता, क्योंकि जिनकी शक्ति देखी जा चुकी है, ऐसी औषधियां जब किमी प्रामरोग सहित अर्थात् अजीर्ण के रोगी को दी जाती हैं, तब अजीर्ण रोग से उन औषधियों की शक्ति प्रतिहत हो जाती है और वे अपना कार्य करने में असमर्थ पाई जाती हैं। -. १. धवल पु. १ पृ. ३४१ । २. यह गाथा धवल पु. १ पृ. ३४२ तथा प्रा पं. सं. गा, १०८ पृ. २३ पर है। ३. धवल पु. १ पृ. ३४२ । ४. धवल पु. ७ पृ. ८१-८२ ।
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