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________________ माथा २५६-२५८ पोगमार्गगा/३३७ गोम्मटसार कर्मकाण्ड की टीका में त्रिकोणयंत्र दिया हुआ है। उस त्रिकोण यंत्र से यह सिद्ध हो जाता है कि 'डे दगुरबहानि प्रमाण समयप्रबद्ध हमेशा सत्ता में रहता है, किन्तु औदारिक पारीर, वैक्रियिक शरीर और पाहारक शरीर इन तीनों शरीरों का डेढ़ गुरमहानि समयप्रबद्ध अपनीअपनी स्थिति के अन्तिम समय में होता है। _ विशेष के लिए इस सम्बन्ध में गोम्मटसार कर्मकाण्ड गा. ६४२ व १४३ की टीका देखनी चाहिए। पोरालियवरसंचं देवुत्तरकुरुवजावजीवस्स । तिरियमणुस्सस्स हवे चरिमदुचरिमे तिपल्लठिदिगस्स ।।२५६।। वेगुस्वियवरसंच बाथीस-समुद्दपारणदुगम्हि । जह्मा वरजोगस्स य बारा अण्णत्थ रणहि बहुगा ॥२५७॥ तेजासरीरजेटु सत्तमचरिमम्हि बिवियवारस्स । कम्मस्स वि तस्थेव य पिरये बहुवारभमिदस्स ॥२५८॥ गाथार्थ-तीन पल्योपम की स्थितिबाले देवकुरु अथवा उत्तरकुरु में उत्पन्न हुए तिथंच या मनुष्य के चरम व द्वित्र रम समय में औदारिक शरीर का उत्कृष्ट संचय होता है ।।२५६॥ बाईस सागर की युवाले पारण-अच्युत स्वर्ग के देवों में ही वैऋियिक शरीर का उत्कृष्ट संचय होता है, क्योंकि उत्कृष्ट योग के बार आदि अन्यत्र बहुधा नहीं होते ॥२५७।। सप्तम पृथिवी में दूसरी बार उत्पन्न हुए नारकी के तैजस शरीर का उत्कृष्ट संचय होता है। अनेक बार नरकों में भ्रमण करके सप्तम पृथिवी में उत्पन्न हुए नारकी के अन्तिम समय में कार्मरा शरीर का उत्कृष्ट संचय होता है ।।२५८॥ विशेषार्थ—गाथा २५६ में तीन पल्य की आयु वाले देवकुरु व उत्तरकुरु के मनुष्य व तिर्यंच दोनों को प्रौदारिक शरीर के उत्कृष्ट प्रदेशाग्र का स्वामी कहा है, किन्तु धवल पु. १४ पृ. ३६८ सूत्र ४१८ में मात्र मनुष्य को स्वामी कहा है, वह सूत्र इस प्रकार है "अण्णदरस्स उत्तरकुरुदेवकुरुमणुअस्स तिपलिदोवमद्विवियस्स ॥४१८॥" उपर्युक्त गाथा में चरम व विचरम दोनों समयों में स्वामी बताया गया है, किन्तु धवल पु. १४ सूत्र ४२६ में मात्र चरम समय में स्वामी बतलाया गया है । वह सूत्र इस प्रकार है ... "तस्स चरिमसमयतम्भवत्थस्स तस्स पोरालियसरीरस्स उपकस्सयं पदेसग्मं ॥४२६॥" गाथा २५७ में वैक्रियिक शरीर के उत्कृष्ट प्रदेशाग्र के स्वामित्व का कथन तो किया गया है, किन्तु समय का कथन नहीं है । धवल पु. १४ पृ. ४१३ सूत्र ४४३ में उसके स्वामित्व का काल चरमसमय बतलाया गया है । वह सूत्र इस प्रकार है--- "तस्स चरिमसमक्तम्भवत्यस्स तस्स बेउन्सियसरीररस उक्करसयं पदेसम्म ॥४४३३॥"
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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