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________________ गाथा २५०-२५१ योगमार्गणा/३२७ शङ्का-याहारक शरीर का 'प्रथम समय तद्भवस्थ' विशेषरग कैसे बन सकता है ? समाधान- यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि औदारिक शरीर को छोड़कर आहारव शरीररूप से परिणत हुए जोत्र का अवान्तरगमन है, इसलिए 'प्रथमसमयतद्भवस्थ' विशेषण बन जाता है।' उत्कृष्ट वृद्धि से वृद्धि को प्राप्त हुआ ।।४४८॥ सबसे लघु अन्तमुहर्त काल द्वारा सब पर्याप्तियों से पर्याप्त हुप्रा ।।४४६।। उसके बोलने के काल अल्प हैं ।।४५०॥ मनोयोग के काल अल्प हैं ।।४५१।। छविच्छेद नहीं हैं ॥४५२।। निवृत्त होने के काल के थोड़ा शेष रह जाने पर योगययमध्यस्थान के ऊपर परिमित्तकाल तक रहा ।।४५३।। अन्तिम जीवगुणहानि स्थानान्तर में प्रावली के असंख्यातवें भाग प्रमाण काल तक रहा ।।४५४।। चरम और द्विचरम समय में उत्कृष्ट योग को प्राप्त हुमा ।।४५५॥ निवृत्त होनेवाला वह जीव अन्तिम समय में आहारक शरीर के उत्कृष्ट प्रदेशाग्र का स्वामी है ।।४५६॥ औदारिक शरीर सम्बन्धी कथन में विशेष रूप से कथन हो चुका है तथापि जो विशेषता है, उसका कथन इस प्रकार है--प्रमत्तसंयत आहारक शरीर को उत्पन्न करता हुआ अपर्याप्त काल में अपर्याप्तयोग वाला होता है अन्यथा उत्कृष्ट वृद्धि द्वारा आहारक मिन काल के वृद्धि नहीं बन सकती। दुसरे, निषेक-रचना करने पर अवस्थित रूप से ही निषेक रचना होती है, गलितावशेष निधेकरचना नहीं होती। शङ्का -- यह किस कारण जाना जाता है ? समाधान—क्योंकि पाहारकशरीर की निर्जरा होने का कान अन्तर्मुहूर्त प्रमाण कहा गया यदि कहा जाय कि कालभेद के बिना एक ही समय में निक्षिप्त हुए प्रदेशों का एक समय के बिना अन्तर्मुहूर्त में गलना सम्भव है सो ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा होने में विरोध आता है। इसी प्रकार तिथंच और मनुष्यों में वैफियिकशरीर की निषेक-रचना वाहनी चाहिए, अन्यथा वहाँ पर क्षीण होने का काल अन्तर्मुहुर्त प्रमाण होने में विरोध पाता है । तजस शरीर के उत्कृष्ट प्रदेशानका स्वामी अन्यतर पूर्वकोटि को प्रायुवाला जीव जो नीचे सातवीं पृथिवी के नारकियों के आयु कर्म का बन्ध करता है ।।४६०॥ जो पूर्वकोटि अायुबाला जीव सातवीं पृथिवी के नारकियों में आयुकर्म का बन्ध करता है वह तैजसशरीर के छयासठ सागर प्रमाण स्थिति के प्रथमसमय से लेकर अन्तिम समय तक गोपुच्छाकाररूप से निषेक रचना करता है। जो सातवी पृथिवी के नारकियों की आयु का बन्ध करता हुआ स्थित है वहीं तेजस शरीरनोकर्म की उत्कृष्ट स्थिति का बन्ध करता है, ऐसा नहीं ग्रहण करना चाहिए, किन्तु जो पूर्वकोटि की आयुवाला पर्याप्त और उत्कृष्ट योगबाला जीव मागे पूर्वकोटि के विभाग शेष रहने पर सातवीं पृथिवी के मारकियों की आयु का बन्ध करने में समर्थ है, वह तेजस शरीर नोकर्म की उत्कृष्ट स्थिति का बन्ध करता है, ऐसा यहाँ ग्रहण करना चाहिए। अन्यथा पूर्व कोटि की पायवाला बांधता है, इस प्रकार के नियम करने का कोई फल नहीं रहता। १. प.पु. १४ पृ. ३३६ । २. घवल पु. १४ पृ. ४१५ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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