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________________ ३२६/गो. सा. जीवकाण्ड गाथा २५०.२५१ अच्युत कल्पवासी अन्यतर देव है ।। ४३१-४३२।।' सम्यक्त्व और मिथ्यात्व ग्रादि के निमित से द्रव्य विशेष नहीं होता। शङ्का-दीर्घ आयुवाले सर्वार्थसिद्धि के देवों में उत्कृष्ट स्वामी क्यों नहीं होता? समाधान- नहीं, क्योंकि नौ ग्रेवेयक प्रादि ऊपर के देवों में उत्कृष्ट योग के परावर्तन के बार प्रचुरमात्रा में नहीं उपलब्ध होते । ऊपर अवगाहना ह्रस्व है, इसलिए वहाँ पर स्वामित्व नहीं कहा गया, ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि योग के बणसे आनेवाले कर्म व नाकम पुगलों को अवगाहना विशेष के कारण संख्याविशेष उत्पन्न नहीं होती। शङ्का-नीचे के देवों में उत्कृष्ट स्वामित्व क्यों नहीं कहा गया ? समाधान नहीं, क्योंकि वहाँ पर लम्बी आयु का अभाव है। शडा-सातवीं पृथिवी के नारकियों को आयु लम्बी होती है और उत्कृष्ट योग भी है, वहाँ उत्कृष्ट स्वामित्व क्यों नहीं कहा ? समाधान--नहीं, क्योंकि वहाँ संक्लेशों की बहुलता है, इसलिए उनमें बहुत नोकर्मों की निर्जरा होती है। उसी देव ने प्रथम समय में आहारक और प्रथम समय में तद्भवस्थ होकर उत्कृष्ट योग से पाहार ग्रहण किया ।।४३३॥ उत्कृष्ट वृद्धि से वृद्धि को प्राप्त हुआ। अन्तर्मुहूर्त प्रमाण सर्व लघुकाल के द्वारा सब पर्याप्तियों से पर्याप्त हवा ॥४३५|| उसके बोलने के काल अल्प हैं ।।४३६॥ मनोयोग के काल अल्प हैं ।।४३७।। उसके छविच्छेद नहीं होते ॥४३८।। क्योंकि वैऋियिक शरीर में छेद ब भेद आदिक नहीं पाये जाते । उसने अल्पतर विक्रिया की ||४३६।। क्योंकि बहुत विक्रिया करने से बहुत परमाणु पुद्गलों के गलन होने का प्रसंग प्राप्त होता है। जीवितव्य के स्तोक मेष रहने पर वह योग यवमध्य के ऊपर अन्तर्मुहतं काल तक रहा ।।४४०॥ अन्तिम जीव गुणहानिस्थानान्तर में प्रावली के प्रसंख्यातवें भाग काल तक रहा ||४४१॥ चरम और द्विचरम समय में उत्कृष्ट योग को प्राप्त हुा ।।४४२।। अन्तिम समय में तद्भवस्थ हुए उस जीव के वै कियिक शरीर के उत्कृष्ट प्रदेशाग्र होते हैं ।।४४३॥ __ आहारक शरीर के उत्कृष्ट प्रदेशाग्न का स्वामी उत्तर शरीर की विक्रिया करनेवाला अन्यतर प्रमत्तसंयत जीव है ।।४४५-४४६।। अवगाहना प्रादि की अपेक्षा द्रध्य भेद नहीं है। प्रमाद के होने पर संयत के आहारक शरीर का उदय होता है। उसी जीव ने प्रथम समय में गाहारक और प्रथम समय में तद्भवस्थ होकर उत्कृष्ट योगद्वारा प्राहार को ग्रहण किया । १. बेउन्धियसरीरस्स उन मस्सयं पदेसग्गं कस्स || ४३१।। अपणदरस्म मारण मच्चुद कप्पवासियदेबस्स वावीससागरोनमछिदिप्रस्म ।। ४३२।।" [पवल पु. १४ पृ. ४११] । २. धवल पु. १४ पृ. ४११। ३. धवल पु. १४ पृ. ४१२-४१३ । ४. “उक्कासपदेरण माहारसरी रस्स उक्कस्सयं पदेसम्गं कस्स । अण्णदरस्म पमत्तसंजदस्स उत्तरसरं विउत्रियम्स ।। ४४६।।" [धवल पु. १४ पृ. ४१४] ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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