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________________ गाथा २५०-२५१ योगमार्गमा ३२५ जीवितव्य काल के स्तोक शेष रहने पर योग यवमध्य के ऊपर अन्तर्मुहूर्त काल तक रहा।' बहुत पुद्गलों का संग्रह करने के लिए वहाँ अन्तमुहर्त काल तक ही रहा, क्योंकि अधिक काल तक वहाँ रहना सम्भव नहीं है। तीन पल्य प्रमाण काल के भीतर जब-जब सम्भव है तब-तब यवमध्य के ऊपर के योग स्थानों में ही परिणमन करता है। अन्तिम जीवगुणहानिस्थानान्तर में प्रावली के असंख्यातवें भाग प्रमाण काल तक रहा ||४२७॥ क्योंकि जो अन्तिम जीवगुणहानि है वहाँ आवली के असंख्यातवें भाग प्रमाण काल का आश्रय लेकर अन्तिम योग से वहाँ के योग असंख्यातगुणे होते हैं किन्तु वहाँ पर पावली के असंख्यातवें भाग से अधिक काल तक ठहरना सम्भव नहीं है। यवमध्य के ऊपर रहता हुआ जब-जब सम्भव है तब-तब अन्तिम जीवगुणहानि-स्थानान्तर में ही रहता है । चरम और द्विचरम समय में उत्कृष्ट योग को प्राप्त हुआ ।।४२८।। ३ क्योंकि योगवृद्धि से प्रदेशबन्ध की वृद्धि बहुत होती है, तथा उत्कृष्ट योग के साथ दो समय. तीन समय और चार समय को छोड़कर सर्वत्र भवस्थिति के भीतर बहुत काल तक परिणमन करने की शक्ति का प्रभाव है। इस भव में जब सम्पद है, टया-तत कदमोग को ही प्राप्त हुआ है। शङ्का-यहाँ पर संक्लेश का कथन क्यों नहीं किया ? समाधान:- क्योंकि मर कर ऋजुगति के प्राप्त होने पर कषाय की वृद्धिहानि से कोई प्रयोजन नहीं। संक्लेश के सद्भाव में अवलम्बन करण के करने से बहुत नोकर्मपुद्गलों के गलने का प्रसंग प्राप्त होता है, इसलिए संक्लेश वास का ग्रहण नहीं किया गया । अन्तिम समय में तद्भवस्थ हुए उस जीव के प्रौदारिकशरीर का उत्कृष्ट प्रदेशाग्र (प्रदेणसमुह) होता है ।।४२६॥ उपसंहार-किसी मनुष्य या तिथंच ने दान या दान के अनुमोदन से तीन पल्य की रियतित्राले देवकुरु या उत्तरकुरु के मनुष्य को प्रायु का बन्ध किया। इस प्रकार इस क्रम से मरकर ऋजु गति से देवकुरु या उत्तरकुरु में मनुष्य उत्पन्न हुआ। पुनः प्रथम समय में प्राहारक और प्रथम समय में तद्भवस्थ होकर उत्कृष्ट उपपादयोग से आहार ग्रहण कर, उन ग्रहण किये गये नोकर्मप्रदेशों को तीन पल्य के प्रथम समय से लेकर अन्तिम समय तक गोपुच्छाकार से निक्षिप्त किया फिर द्वितीय समय से लेकर उत्कृष्ट एकान्तानुवृद्धि योग से वृद्धि को प्राप्त होता हुआ अन्तर्मुहूर्त काल तक असंख्यातगुणित श्रेणिरूप से नोकर्म प्रदेशों को ग्रहण कर तीन पल्प प्रभाग काल में निक्षिप्त किया। पुनः अतिशीघ्र पर्याप्तियों को समाप्त करके और परिणामयोग को प्राप्त होकर उपर्युक्त कही गई विधि से पाकर जो अन्तिम समय में स्थित होता है, वह उत्कृष्ट द्रव्य का स्वामी होता है । वैक्रियिकशरीर के उत्कृष्ट प्रदेशाग्र का स्वामी बाईस सागर की स्थितिवाला आरण और १. "थोवाघससे जीविदवाए ति जोगजवमस्मरबरिमतो मुहूत्तद्धमच्छिदो ।। ४२६।। धबल पु. १४ पृ. ४०२ । २. "चरिमे जीत्रगुणहारिणवाणं तरे भावलियाए प्रसंघ जदिभागमच्छिदो ॥४२७।।" [धवल पु. १४ पृ. ४०३] । ३. "चरिम-दुचरिमसमए उक्कस्स जोगं गदो ॥४२८|| [धवल पु. १४ पृ. ४०३] । ४. "तस्स चरिम समयतभवत्यस्स तरस पोरालियसरीररस उवकरसयं पदेसम्गं ।।४२६।।''[ध.पू. १४ पृ. ४०४]। ५. ध.पु. १४ पृ. ४०४-४०५ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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