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________________ ३२४ / गो. सा. जीवकाण्ड गायाः २५० २५१ समय जो ग्राहारक होता है उसका प्रतिषेध करने के लिए 'प्रथम समय में तद्भवस्थ होकर आहार ग्रहण किया' यह विशेषण दिया है । शङ्का - विग्रहगति से उत्पन्न होने में क्या दोष है ? समाधान- नहीं, क्योंकि दो समय में संचित हुए द्रव्य के प्रभाव का प्रसंग आता है । उत्कृष्ट वृद्धि से वृद्धि को प्राप्त हुआ ||४२०|| १ प्रथम समय के योग से द्वितीय समय का योग असंख्यातगुणा हैं। दूसरे समय के योग से तीसरे समय का योग असंख्यात गुणा है। इस प्रकार एकान्तानुवृद्धि योग के अन्तिम समय तक लेजाना चाहिए। जघन्य वृद्धि का प्रतिषेध करने के लिए 'उत्कृष्ट वृद्धि से वृद्धि को प्राप्त हुआ' यह कहा है । ३ सबसे लघु मुहूर्त काल द्वारा सब पर्याप्तियों से पर्याप्त हुआ ||४२१ । ३ छहों पर्याप्तियों के पूरे होने के काल जघन्य भी हैं और उत्कृष्ट भी हैं। उसमें प्रन्तर्मुहूर्त प्रमाण सर्व जघन्य काल द्वारा स पर्याप्तियों से पर्याप्त हुआ । शंका- लघु पर्याप्तकाल किसलिए ग्रहण किया जाता है ? समाधान – क्योंकि पर्याप्तकालीन परिणामयोग से अपर्याप्तकालीन एकान्तानुवृद्धियोग प्रसंख्यातगुणे हीन होते हैं। अतः उनके द्वारा बहुत पुद्गलों का ग्रहण नहीं होता। इसलिए अपर्याप्त काल लघु ग्रहण किया गया। उसके बोलने के काल अल्प हैं ||४२२ || * भाषा के व्यापार से जो परिश्रम होता है, उससे तथा भाषारूप पुद्गलों का अभिघात होने से बहुत श्रदारिक शरीर पुद्गलों की निर्जरा होने का प्रसंग आता है, इसलिए भाषाकाल स्तोक चाहिए । मनोयोग के काल अल्प हैं ||४२३ ।। * चिन्ता के कारण जो परिश्रम होता है, उससे गलने वाले मुगलों का निषेध करने के लिए “मनोयोग के काल अल्प हैं" यह कहा है । छविछेद है ||४२४|| छवि शरीर को कहते हैं। उसके नख आदि का क्रियाविशेष के द्वारा खंडन करना छेद है । चे छेद यहाँ पर अल्प अर्थात् स्तोक हैं। जिनसे शरीरपीड़ा होती है, वे वहां प हैं । आयुकाल के मध्य कदाचित् विक्रिया नहीं की ।। ४२१|| तीन पत्य की आयु का पालन करते हुए कदाचित् विक्रिया नहीं की, क्योंकि श्रदारिक शरीर का त्याग कर विक्रिया रूप को ग्रहण करनेवाले के केवल औदारिक शरीर की निर्जरा होने का प्रसंग आता है। यह विक्रिया रूप शरीर भी श्रीदारिक है, ऐसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि विक्रिया रूप शरीर के श्रदारिक होने का निषेध है । " १. ३. कस्मियाए बड्डी बडदो ||४२०१ धवल पु. १४ पृ. ४oo नमुने मल सम्बाहि पज्जतीहि पज्जतयदी ॥४२१|| " प्रणाम भामायां ॥४२२।। । धवल पु. १४ . ४०१ יך २. धवल पू. १४ [ धबल पु. १४ ध्रु. ४०० ] | ५. अप्पमो मरा जोगदान १४२३॥ धवल पू. १४ पृ. ४०१]। ७. "अंतरेण कदाइ विधिदो [ धवल पु. १४ पृ. ४०१ ] । ६. "अप्पा छविच्छेद || ४२४) ॥४२५॥ [ ध.पु. १४ पृ. ४०१] । ८. ध. पु. १४ पृ. ४०२ । पृ. ४०० । ४. "तहम
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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