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________________ ३२०/गो, सा, जीवकाण्ड तंजस शरीर सम्बन्धी समयप्रबद्ध व वगणा का अवगाहना का प्रमाण प्राप्त होता है । उसको भी सूच्यंगुल के असंख्यातचे भाग से भाग देने पर कार्मण शरीर के समयप्रबद्ध व वर्गशा की अवगाहना प्राप्त होती है। बिनसोपचय का स्वरूप जीवादो गंतगुणा पडिपरमाणुम्हि विस्ससोयचया । जीवेण य समवेदा एक्केवक पडिसमारणा हु॥२४६॥ गाथार्य- (कर्म और नोकर्म के) प्रत्येक परमाणु पर जीवराशि से अनन्तगुणे विनसोपचय हैं, वे जीव के साथ समवेत हैं । एक-एक के प्रति समान हैं ।।२४६।।। विशेषार्थ-शङ्का-विस्रसोपचय किसकी संज्ञा है ? समाधान—पाँच शरीरों के परमाणपुद्गलों के मध्य जो पुद्गल स्निग्ध प्रादि गुणों के कारण उन पाँच शरीरों के पुद्गलों में लगे हुए हैं, उनकी बिनसोपचय संज्ञा है। उन विस्रसोपचयों के सम्बन्ध के कारण पाँच शरीरों के परमाणु रुप पुद पनगान निम्न आदि गुण हैं, उनी भी विस्रसोपच्य संज्ञा है, क्योंकि यहाँ कार्य में कारण का उपचार किया है। एक-एक प्रौदारिक प्रदेश (परमाणु ) में सब जीवों से अनन्तगुणे विभाग प्रतिच्छेद होते हैं । शङ्का-अविभागप्रतिच्छेद किसे कहते हैं ? समाधान एक परमाणु में जो जघन्य वृद्धि होती है, उसे अविभागप्रतिच्छेद कहते हैं । इस प्रमाण से परमाणुओं के जघन्यगुण अथवा उत्कृष्ट गुण का छेद करने पर सब जीवों से अनन्तगुरणे अनन्त अविभागप्रतिच्छेद होते हैं। एक-एक परमाणु में जितने अविभागप्रतिच्छेद होते हैं, एक-एक परमाणु में एक बन्धनबद्ध विस्रसोपचय परमाणु भी उतने ही होते हैं, क्योंकि कार्य कारण के अनुसार देखा जाता है। यहाँ पर सब जीवों से अनन्तगुणत्व की अपेक्षा समानता है, संख्या की अपेक्षा नहीं, क्योंकि जघन्य अनुभाग के कारण लगे हुए स्तोक विस्रसोपचयों से निष्पन्न जघन्य प्रत्येक शरीर वर्गरणा की पेक्षा जघन्य अनुभाग से अनन्तगुणे अनुभाग के कारण आये हुए बिनसोपचयों से निष्पन्न उत्कृष्ट प्रत्येक शरीर बर्गरणा के अनन्तगुणे होने का प्रसंग आता है। शङ्का-विस्रसोपचयों की अविभागप्रतिच्छेद संज्ञा कैसे है ? समाधान-कार्य में कारण का उपचार करने से अबिभाग प्रतिच्छेदों के कार्यरूप बिनसोपचयों की वह संज्ञा सिद्ध होती है। पुद्गलपरमाणु और जीवप्रदेश परस्पर में अनुगत हो जाते हैं। अथवा परमाणु की जीवप्रदेश संज्ञा होने में कोई विरोध नहीं पाता। अतः जीवेन सह समवेताः' ऐसा कहा गया है । १. धवल पु. १४ पृ. ४३० । २. "यविभागपडिच्छेदपरूवरणदाय एक्के कम्पि पोरालियपदेसे केवटिया अविभागपडिच्छेदा ॥५०३॥ अयंता अविभागपडिच्छेदा सम्वजीवेहि अणंत गुणा ॥५०४||"[श्वल पु. १४ पृ. ४३१ । ३. धवल पु. १४ पृ. ४३१ । ४. धवल पु. १४ पृ. ४३२ । ५. "जीव-पोम्गलाणमणगायाणगयत्ते परमाणम्स वि जीवपदसवदा साविरोहादो वा।" [घवल पु. १४ पृ. ४३६] ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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