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________________ पापा २४५-२४० योगमार्गग/३१ प्रदेशाग्र की अपेक्षा अनन्तगुणी होती हैं, क्योंकि ऐसा स्वभाव है। अभव्यों से अनन्तगुणा और सिद्धों के अनन्तभागगुरगाकार है। भाषा वर्गणाएँ, मनोवर्गणाएँ और कार्मण शरीर बर्गणाएं प्रदेशार्थता की अपेक्षा अनन्तगुणी हैं ।।७८६ ।। उसी समय में उसी योग से भाषा वर्गणाओं में से भाषा रूप पर्याय से परिणमन करने वाली वर्गणाएँ प्रदेशाग्र की अपेक्षा अनन्तगुणी होती हैं। उसी समय में उसी योग से मनोद्रव्य वर्गणाओं में से द्रव्यमान के लिए आनेवाली वर्गणाएं प्रदेशाग्र की अपेक्षा अनन्तगृगी होती हैं। उसी समय में उसी योग से कार्मण द्रव्य वर्गणानों में से पाठों को के लिए गोदाली वर्गणार की मेला अनन्तगुणी होती हैं। सर्वत्र गुणाकार अभव्यों से अनन्तगुणा और सिद्धों के अनन्तवं भाग प्रमाण होता है ।' अवगाहना अल्पबहुत्व-कार्मणशरीर द्रव्य वर्गणाएँ अवगाहना की अपेक्षा सबसे स्तोक हैं। क्योंकि एक धनाङ्गल में अङ्ग ल के असंख्यातवें भाग का भाग देने पर एक कार्मण वर्गणा की अवगाहना उत्पन्न होती है। मनोद्रव्य वर्गणाएं अवगाहना की अपेक्षा असंख्यातगुणी हैं। अंगुल के असंख्यातवें भागप्रमाण गुणाकार है। भाषावर्गणाएं अवगाहना की अपेक्षा असंख्यातगुणी है ।।७६२।। अंगुल के असंख्यातवें भागप्रमाण गुणाकार है। तैजसशरीर द्रव्यवर्गणाएँ अवगाहना की अपेक्षा असंख्यातगुणी हैं ।। ७९३|| अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण गुणाकार है। ग्राहारक शरीर द्रव्य वर्गणाएँ अवगाहना की अपेक्षा असंख्यात गुणी हैं ।।७६४॥ अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाग गुणाकार है बैंक्रियिक शरीर द्रव्य वर्गणाएं अवगाहना की अपेक्षा असंख्यात गुणी हैं ||७६५|| अंगुल के असंख्यातवें भाग प्रमाण गुणाकार है। औदारिक शरीर द्रव्य बर्गरगाएँ अवगाहना की अपेक्षा असंख्यात गुणी हैं ॥७६६।। अंगुल का असंख्यातवाँ भाग गुणाकार है । इस सब का अभिप्राय यह है कि औदारिक शरीर स्थूल है इससे वैऋियिक शरीर सूक्ष्म है। वक्रियिक शरीर से प्राहारक शरीर सूक्ष्म है। आहारक शरीर से तैजस शरीर सूक्ष्म है । और तेजस शरीर से कार्मरण शरीर सूक्ष्म है। यह कथन अवगाहना की अपेक्षा किया गया है, किन्तु प्रदेश की अपेक्षा औदारिक शरीर से असंख्यातगुणे प्रदेश वक्रियिक शरीर में हैं और वैश्रियिक शरीर से असंख्यात गुणे प्रदेश आहारक शरीर में हैं। पाहारक शरीर से अनन्तगुणे प्रदेश तेजस शरीर में है और तेजस शरीर से अनन्तगुरणे प्रदेश कार्मण शरीर में है। शा-यदि ऐसा है तो पूर्व प्रारीर से उत्तर शरीर महापरिमाण वाला प्राप्त होता है। ___ समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि बन्धविशेष के कारण परिमाण में भेद नहीं होता। __ जैसे रुई का ढेर और लोहे का गोला ।' इन पांचों शरीरों के समयप्रबद्ध में परमाणुओं की संख्या यद्यपि उत्तरोत्तर अधिक-अधिक । होती गई है तथापि अवगाहना सूक्ष्म-सूक्ष्म होती गई है। प्रौदारिक शरीर का समयप्रबद्ध व वर्गणा की अवगाहना, घनांगुल को सूच्यंगुल के असंख्यातवें भाग से भाजित करने पर प्राप्त होता है उसको पुनः सूच्यंगल के असंख्यातवें भाग से भाग देने पर वैक्रियिक शरीर के समय प्रबद्ध व वर्गणा की अवगाहना होती है। उसको पुनः सूत्यंगुल के असंख्यातवें भाग से भाग देने पर आहारक शरीर के समयप्रबद्ध व वर्गणा को अवगाहना होती है पुनः सूरयंगुल के असंख्यातवें भाग से खंडित करने पर १. धवल पु. १४ पृ. ५६२ । २. धवल पु. १४ पृ. ५६२-५६४ । ३. सर्वार्थसिद्धि २१३५-३६ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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