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________________ ३१८ गो. सा. जीबकाण्ड गाथा २४५.२४% द्रव्याथिक नय का अवलम्बन करने पर इन सब की 'वर्गणा' संज्ञा है । वर्गों के समूह का नाम वर्गणा है। वर्गणा एक होती है, परन्तु वर्ग अनन्त होते हैं। अभव्यों से अनन्तगुणे अर्थात् सिद्धों के अनन्तवें भाग प्रमाण वर्गणानों का एकसमय प्रबद्ध होता है। इतना द्रव्य प्रतिससय बाँधा जाता है, इसलिए इसकी समयप्रबद्ध संज्ञा है।' सिद्धराशि के प्रतन्तवें भाग के अनन्त भेद हैं। इसलिए अभव्य राणि से अनन्तगुणा, ऐसा मध्यम अनन्तानन्त सिद्धों के अनन्तवें भाग से ग्रहण करना चाहिए। प्रौदारिक, वैक्रियिक और आहारक शरीर के योग्य पुद्गल स्कन्धों की आहा रद्रत्र्यवर्गणा संज्ञा है। अनन्तानन्तप्रदेशी परमाणु पुद्गल द्रव्य वर्गणा के ऊपर और प्रथम अग्रहण द्रव्य वर्गणा के नीचे यह आहारवर्गणा स्थित है । पाहारवर्गणा के वर्गणाग्र (वर्गणा समूह) के असंख्यात खण्ड करने पर वहाँ वहुभाग प्रमाण पाहारक शरीर प्रायोग्य बर्गणाग्र होता है। शेष के इसंख्यात खण्ड करने पर बहुभाग प्रमाण वैक्रियिक शरीर प्रायोग्य वर्गणार होता है। तथा शेष एकभाग प्रमाण ग्रोहानि र प्रायोग्य वर्गणाग्न होता है। स्तोक वर्गणानों में स्तोक ही आते हैं इसलिए औदारिक शरीर वर्गणा स्तोक है, ऐसा कितने ही प्राचार्य कथन करते हैं। किन्तु यह अर्थ ठीक नहीं है, क्योंकि तेजस शरीर वर्गणा आदि में इस अर्थ की प्रवृति नहीं देखी जाती। औदारिक शरीर द्रव्य वर्गणाएं प्रदेशार्थता (प्रदेशगणना) की अपेक्षा सबसे स्तोक हैं ॥७८५।। यह अल्पबहुत्व, योग से आनेवाले एकसमयप्रबद्ध की वर्गणामों का कहा जा रहा है, सब वर्गणाओं का नहीं। एक योग से पानेवाली औदारिक शरीर द्रव्यवर्गणाएं प्रदेशाग्र और वर्गणा की अपेक्षा स्तोक हैं।५ वैक्रियिक शरीर द्रव्य वर्गणाएँ प्रदेशार्थता की अपेक्षा असंख्यातगुणी हैं ||७८६॥ जिस योग से औदारिक शरीर के लिए आहार वर्गणानों में से औदारिक शरीर वर्गणाएँ एक समय में प्रागमन प्रायोग्य होती हैं, उन्हीं वर्गणानों में से उसी समय में अन्य जीव के उसी योग से वैक्रियिकशरीर के लिए पागमनयोग्य वर्गणाएँ असंख्यातमूणी होती हैं, क्योंकि ऐसा स्वभाव है। जगच्छणी के असंख्यातवें भाग प्रमाण गुणाकार है। प्राहारक शरीर द्रव्य वर्गणाएँ प्रदेशार्थता की अपेक्षा असंख्यात मुरगी हैं ॥७८७।। उसी समय में उसी योग से आहार वर्गणात्रों में से आनेवाली आहारक शरीरद्रव्य वर्गणाएं असंख्यातगुणी होती हैं, क्योंकि ऐसा स्वभाव है। ज.श्रे. के असंख्यातवें भाग प्रमाण गुणाकार है। संजस शरीरद्रव्यवर्गणाएँ प्रदेशार्थता की अपेक्षा अनन्तगुणी हैं ॥७८८। उसी समय में उसी योग के द्वारा तैजस शरीर द्रव्य वर्गणानों में से तेजस शरीर के लिए ग्रानेवाली वर्गरणाएँ १. "एवं कदे प्रभवसिद्धिएहिं प्रणतगुणा सिद्धाणमतभागमेत्ता लद्धा भवंति । एदेसि सन्वेसि वि दवडियणए अवलंबिदे वग्गणा इदि मण्णा। बग्गाणं समूहो वम्मरणा, तेसि व असमूहो वग्यो । बरगणा एगा, वग्गा अणंता ।'' [धवल पु. १२ पृ. १३-६४] । २. "समये प्रबध्यत इति समयप्रबद्धः ।" [धवल पु. १२ पृ. ४५८] । ३. "पोरालिय-वेउब्धिय-प्राहारसरीर पायोग्गपोग्गलक्खंधाणं ग्राहारदब्ध गरा ति सप्एा। ताणंतपदेसियपरमाणुपोग्गलदम्ववग्गरागामुपरि पाहारदब्ववग्गगाणाम ।।७६) पाहारदरुववाणास मुबरि अगह इम्बवग्गणा रणाम ||८०॥" [धवल पु. १४ पृ. ५६] । ४. धवल यु. १४ पृ. ५६०-५६।। ५. धवल पु. १४ पृ. ५६० । ६. धवल पु. १४ पृ. ५६१ । ७. धवल पु. १४ पृ. ५६१ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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