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गाथा २४६
योगमार्गणा/३२१ प्रौदारिक शरीर के अविभागप्रतिच्छेद सबसे स्तोक हैं। उनसे क्रियिकशरीर के अविभागप्रतिच्छेद अनन्तगुणे हैं। सब जीवों से अनन्तगुरणागुणाकार है। उनसे आहारक शरीर के अविभागप्रतिच्छेद अनन्तगुणे हैं । गुणाकार सब जीवों से अनन्तगुणा है । उनसे तैजस शरीर के अविभाग-प्रतिच्छेद अनन्तगुणे हैं । सब जीवों से अनन्तगुणा गुणाकार है। उनसे कार्मण शरीर के अविभाग प्रतिच्छेद अनन्तगुरणे हैं। सब जीवों से अनन्तगुणागुणाकार है ।'
दुसरे प्रकार से बिस्रसोपचय का कथन इस प्रकार है-जिन्होंने औदयिक भाव को नहीं छोड़ा है और जो समस्त लोकाकाश के प्रदेशों को व्याप्त कर स्थित हैं, ऐसे जीवों के द्वारा छोड़े गये पाँच शरीरों की विस्रसोपचय प्ररूपणा की जाती है। पाँच शरीरों का एक-एक परमाणु जीव से मुक्त होकर भी सब जीवों से अनन्तगुणे विस्रसोपचयों से उपचित होता है। इसलिए ये ध्र वस्कन्ध सान्तर निरन्तर वर्गणाओं में समान धन वाले होकर अन्तर्भाव को प्राप्त होते हैं। वे सब लोक में से प्राकर बद्ध हुए हैं।
शङ्का यह कथन किसलिए आया है ?
समाधान-अपने-अपने कहे गये हेतु के अनुसार कर्म के योग्य सादि अनादि और सब जीवप्रदेशों के साथ एकक्षेत्रावगाहपने को प्राप्त हुआ पुद्गल बँधता है। इस वचन के अनुसार जिस प्रदेश पर जो जीव स्थित हैं, वहाँ स्थित जो पुद्गल हैं, वे मिथ्यात्व प्रादि (मिथ्यात्व, अविरत, प्रमाद, कषाय और योग) कारणों से जिस प्रकार पाँच रूप से परिणमन करते हैं, उसी प्रकार यहाँ पर स्थित हुए ही विस्रसोपचय भी क्या बन्ध को प्राप्त होते हैं या नहीं? इस बात का निर्णय करने के लिए यह कथन आया है ।
दे पांचों शरीरों के स्कन्ध समस्त लोक में से आये हए विस्रसोपचयों के द्वारा बद्ध होते हैं। सब लोकाकाश के प्रदेशों पर स्थित हुए पुद्गल समीरण आदि के वश से या गति रूप परिणाम के कारण प्राकर उनके साथ सम्बन्ध को प्राप्त होते हैं । अथवा पांचों शरीरों के पुद्गल जीव से मुक्त होने के समय में ही समस्त आकाश को व्याप्त कर रहने हैं।"
ग्रौदारिक शरीर के जो एक गुणयुक्त वर्गणा के द्रव्य हैं, वे बहुत हैं और वे अनन्त बिनसोपचयों से उपचिन हैं ।।५३६॥ अनन्त विस्रसोएचयों से उपचित एक गुगायुक्त वर्गणा के द्रव्य शलाकाओं की अपेक्षा बहुत है।
शङ्का-- एक गुणा से क्या ग्रहण किया जाता है ?
समाधान-जघन्य गुण ग्रहण किया जाता है। वह जघन्य गुण अनन्त अविभागप्रतिच्छेदों से निष्पन्न होता है।
शङ्का---यह किम प्रमाण से जाना जाता है ?
१. ३वल पु. १४ पृ. ४३७-४३८ सूत्र ५१५-५१६ । २. ' ते च सब्बलोगागदेहि बद्धा ।।५२२॥" [धवल पु. १४ पृ. ४३६ । ३. ६.पु. १४ पृ. ४३९-४४०। ४. ध.पु. १४ पृ. ४४० । ५. 'ओरालियसरीरस्म जे एम गुणजुत्तदम्गपाए दवा ते बहुप्रा प्रणतेहि विस्सासुबचएहि उवचिदा ||५३६।। [ध.पु. १४ पृ. ४५०] ।