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________________ गाथा २३५-२४० योगमार्गणा, ३११ __ अाहारकमिश्नकाययोगी का जघन्यकाल से उत्कृष्ट काल संख्यातगुणा है। पूर्व में जिमने अनेक बार याहारक शरीर को उत्पन्न किया है ऐसा कोई एक प्रमत्तसंयत जीव अाहार कमिथकाययोगी हुआ और सबसे लघु अन्तर्मुहूर्त से पर्याप्तकपने को प्राप्त हुआ । इस प्रकार से जघन्यकाल प्राप्त होता है। नहीं देखा है मार्ग को जिसने अर्थात् पूर्व में कभी पाहारक शरीर उत्पन्न नहीं किया, ऐसा कोई प्रमत्तसंवत जीव आहारकमिश्रकामयोगी हुआ और जघन्यकाल से संख्यातगुणे सबसे बड़े काल अर्थात अन्तर्मुहूर्त द्वारा पर्याप्तियों की पूर्णता को प्राप्त हुआ । इस प्रकार उत्कृष्टकाल प्राप्त होता है।' पाहारकाकाययोगी का एकाजीव अपेक्षा जघन्यकाल एकसमय है । मनोयोग या वचनयोग में विद्यमान कोई एक प्रमत्तसंयत जीव आहारक काययोग को प्राप्त हुआ और द्वितीय समय में मरा अथवा मूल शरीर में प्रविष्ट हो गया । इस प्रकार एक समय काल प्राप्त होता है। आहारककाययोगी जीव का उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहुर्त है ।।२१२।। मनोयोग या वचनयोग में विद्यमाम कोई एक प्रमत्तसंयत जीव प्राहारक काय योग को प्राप्त हृया। वहाँ पर सर्वोत्कृष्ट अत्तम हर्त काल रह करके अन्य योग को प्राप्त हुमा ।५ इस प्रकार उत्कृष्टकाल प्राप्त होता है। जिस जीव के प्राहारकशरीर का उदय होता है उसके पच्चीस, सत्ताईस, अट्ठाईस और उनतीस ये चार उदयस्थान नामकर्म के होते हैं। पच्चीस प्रकृतिक उदयस्थान इस प्रकार हैंमनुष्यगति, तैजस शरीर, कार्मरण शरीर, आहारक शरीर, प्राहारक-मङ्गोपांग, वर्णचतुष्क, उपघात, अगुरुलघु, पञ्चेन्द्रिय जाति, स्थिर, अस्थिर, शुभ, अशुभ, प्रादेय, अस चतुष्क, समचतुरस्रसंस्थान, सुभग, यशस्कोर्ति और निर्माण । शरीर पर्याप्ति से पर्याप्त होने पर परघात और प्रशस्तविहायोगति इन दो प्रकृतियों के मिलने पर २७ प्रकृतिक उदयस्थान होता है। आनापान पर्याप्ति के पूर्ण होने पर उज्छव वास प्रकृति मिलने से प्राईस प्रकृतिक उदयस्थान होता है। भाषा पर्याप्ति से पर्याप्त होने पर सुस्वर प्रकृतिक के उदय होने से उनतीस प्रकृतिक उदयस्थान होता है। इन चार उदयस्थानों से स्पष्ट हो जाता है कि आहारक शरीर में संहनन नामकर्म का उदय न होने से अस्थि (हड्डी) आदि सात धातु नहीं होती। रोम के अग्रभाग के आठवें भाग प्रमाण सिरच्छिद्र दशम द्वार से आहारक पुतला निकलता है । अतः उत्तांग से उत्पन्न होता है, ऐसा कहा है। - : १. घबल पृ. ४ पृ. ४३३। २. “एग जीवं पडुन्च जहण्यगोगा एगसमयो ।।२११।।'' (धवल पु. ४ पृ. ४३१) । ३. घवल पु. ४ पृ. ४३२ । ४. "उक्कास्सेण मंतोमुहत्तं ।।२१२।। (धवल पु. ४ पृ. ४३२)। ५. धवल पु. ४ पृ. ४३२ । ६. "ग्राहारसीरुदयं जस्स य हाणारण तस्स चत्तारि | पणुवीस, सत्तबीस, अट्ठावीसं च उगुतीस ।।१७०।। तत्थ इमं पणुषीस मणुसगई तेय, कम्म प्राहारं । तस्रा य अंगोवंगं वषाच उनकं च उपघायं ।।१७१।। मगुरुयलहु चिदिय-थिराथिर सुहासुहं च प्रादेज्ज । तसचव समचवरं सुहयं जसरिंग मिण भय एगोदु ।।१७२।। एमेव ससबीसं सीरपज्जत्तयस्स परघायं । पविखनिय पसस्थगई भगो वि एत्य एगो दु ।। १७३।। एमेवट्ठावीस मारणापम्जत्तयस्म उम्सास । पक्खित्ते तह चेय य भंगो विय एन्थ एगी दु ।।१७४।। एमेकापतीरां भासा पज्जत्तयस्स सुस्सरयं । पविखविय एय भंगो सव्वे मंगा दु चत्तारि ।।१७५।। [प्रा.पं.सं. पृ. ३७१-३७३ मप्ततिका अधिकार] । ७. "रोपागाष्टम भागप्रमाणशिरोदशम द्वारच्छिन्नादाहारक-पुतलक निर्गच्छति ।" [ तत्वार्थवृत्ति २/४६) ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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