SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 342
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ गाथा २३५-२४० योगमार्गणा/३०६ परिनिर्वाणगमन तथा तीर्थंकरों के परिनिष्क्रमण (दीक्षा) कल्याएवा, यह तीसरा कारण है। विक्रियाऋद्धि से रहित और आहारकलब्धि से युक्त साधु अवधिज्ञान से या श्रुतज्ञान से या देवों के आगमन के विचार से केवलज्ञान की उत्पत्ति जानकर 'वन्दनाभक्ति से जाता है ऐसा विचार कर माहारक शरीर रूप से परिणमन कर उस प्रदेश में जाकर उन केवलियों की और दसरे जिनों व जिनालयों की बन्दना करके बापिस पाता है। इन तीनों ही कारणों का अवलम्बन लेकर ग्रहण किये जाने वाले आहारक शरीर की नाम निरुक्ति यह है-'निपुरण' अर्थात् अण्हा और मदु यह उक्त कथन का तात्पर्य है। स्निग्ध अर्थात धवल, सुगन्ध, सृष्ठ और सून्दर यह उक्त कथन का तात्पर्य है। अप्रतिहत का नाम सूक्ष्म है। याहार द्रव्यों में से आहारक शरीर को उत्पन्न करने के लिए निपुणतर और स्निग्धतर स्कन्धों को बाहरण करता है अर्थात् ग्रहण करता है, इसलिए आहारक कहलाता है। शङ्कर निपुण और स्निग्ध सूक्ष्मतर कैसे हो सकते हैं ? समाधान-नहीं, क्योंकि प्रथम अवस्था को देखते हुए तर और तम प्रत्यय के विषयभूत पदार्थों के सूक्ष्मतर होने में कोई विरोध नहीं पाता । अथवा आहारक द्रव्य प्रमाण है। उनमें से निपुणों में अतिनिपुण, निष्णातों में अतिनिष्णात और सूक्ष्मों में अतिसूक्ष्म को प्राहरण करता है अर्थात् जानता है, इसलिए आहारक कहा गया है। शङ्खा- यदि आहारक शरीर वर्गणाएँ पाँचों वर्णवाली होती हैं तो माहारक शरीर धवल होता है, यह कंसे कहा गया है ? समाधान नहीं, क्योंकि विस्रसोपचय की धवलता को देखकर यह उपदेश दिया है। शङ्का-आहारक शरीर वर्गणाएँ पाँच रसवाली होती हैं, अतः अशुभ रस की संभावना होने पर आहारक शरीर मधुर होता है, यह कैसे बन सकता है? समाधान-- नहीं, क्योंकि अप्रशस्त रस वाली वर्गणाणों का अव्यक्त रस होने से वहाँ मधुर रस का उपदेश दिया गया है । आहारकशरीर वर्गणाएँ बो गन्धबाली होती हैं । यहाँ पर भी सुगन्धपना पूर्व के समान कहना चाहिए। आहारकशरोर वर्गणाएँ पाठ स्पर्शवाली होती हैं । यहाँ पर भी आहारक शरीर का शुभस्पर्श पूर्व के समान कहना चाहिए। अथवा अशुभ रस, अशुभ गन्ध और अशुभ स्पर्शवाली वर्गणाएँ आहारक शरीर रूप से परिणमन करती हुई शुभ रस, शुभ गन्ध और शुभ स्पर्श रूप से परिशमन करती हैं, ऐसा यहां पर कहा गया है । याहारककाययोग और आहारकमिश्रकाययोग ऋद्धि प्राप्त छठे गुगास्थानवर्ती प्रमत्तसंयत के १. बबल पु. १४ पु. ३२६-३२७ । २. धबल पु. १४ पृ. ५५७-५५६ । ३. घबल पु. १४ पृ. ५५८ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
JainGPT.orgInstagram
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy