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________________ गाय। २९६-२४० योगमार्गला/३०७ पाहरदि प्रणेग मुरगी सुहमे अत्थे सयस्स सदेहे । गत्ता केवलिपासं तम्हा पाहारगो जोगो ॥२३६॥' पाहारयमुत्तत्थं विजाण मिस्सं तु अपरिपुण्णं तं । जो तेग संपजोगो प्राहारयमिस्सजोगो सो ॥२४०॥' गाथार्थ-असंयम के परिहार तथा सन्देह को दूर करने के लिए प्रमत्तसंयत मुनि के आहारक शरीरनामकर्मोदय से पाहारक शरीर होता है ।।२३५॥ निज क्षेत्र में केवली विक (केवली व श्रतकेवली) का अभाव होने पर किन्तु दूसरे क्षेत्र में सद्भाव होने पर तप आदि कल्याणकों के दर्शन के लिए और चैत्य व चैत्यालय की वन्दना के लिए भी पाहारक शरीर उत्पन्न होता है ॥२३६।। यह आहारक शरीर उत्तमाङ्ग से उत्पन्न है, सप्त धातुओं से रहित है, शुभ है, संहनन से रहित है, शुभ संस्थान वाला है, धवल है, एक हस्त प्रमाण अवगाहना बाला है, प्रशस्त नामकर्मोदय का कार्य है ॥२३७।। व्याघात से रहित है, इसकी जघन्य व उत्कृष्ट स्थिति अन्तर्मुहूर्त काल प्रमाण है। पर्याप्ति के पूर्ण होने पर कदाचित् मरण भी सम्भव है ।।२३८॥सपने को सन्देह होने पर मुनि इस शरीर के द्वारा केबनी के पास जाकर सूक्ष्म पदार्थ का आहरण (ग्रहण) करता है, इसलिए इस शरीर के द्वारा होने वाला योग आहारककाययोग है ।।२३६।। उक्त स्वरूपवाला पाहारक शरीर जव तक अपर्याप्त रहता है तब तक वह आहारकमिथ है। उसके द्वारा होनेवाला संप्रयोग वह पाहारकमिश्र काययोग है ।।२४०॥ विशेषार्थ-3जिसके द्वारा आत्मा सूक्ष्म पदार्थों को ग्रहण करता है अर्थात् आत्मसात् करता है वह आहारक शरीर है। उस पाहारक शरीर से जो योग होता है, वह पाहारककाययोग है। शङ्का-दारिक स्कन्धों से सम्बन्ध रखनेवाले जीवप्रदेशों का हस्तप्रमाण, शंख के समान धवल बर्णवाले और शुभ अर्थात् समचतुरस्र संस्थान से युक्त अन्य शरीर के साथ कैसे सम्बन्ध हो सकता है? समाधान- यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि जीव के प्रदेश अनादिकालीन बन्धनों से बद्ध होने के कारण मूर्त हैं, अतएव उनका मूर्त आहारक शरीर के साथ सम्बन्ध होने में कोई विरोध नहीं आता है । और इसीलिए उनका फिर से प्रौदारिक शरीर के साथ संघटन होना भी विरोध को प्राप्त नहीं होता है। शङ्का-जीब का शरीर के साथ सम्बन्ध करने वाला आयु कर्म है 1 जीव तथा शरीर का परस्पर वियोग होना मरण है। इसलिए जिसकी आयु नष्ट हो गई है ऐसे जीव की फिर से उसी शरीर में उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि ऐसा मानने में विरोध प्राता है अत: जीव का प्रौदारिक शरीर के साथ पुनः संघटन नहीं बन सकता। अर्थात् एक बार जीवप्रदेशों का पाहारक शरीर के साथ सम्बन्ध हो जाने के पश्चात् पुनः उन प्रदेशों का पूर्व औदारिक शरीर के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता? १.व २. धवल पु. १ पृ. २६४; प्रा.पं.सं. पृ. २१ गाथा १७-६% । ३. धवल पु. १ पृ. २९२ 1
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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