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३०६/गो. सा, जीवनागड
गाथा २३५-२३०
समाधान-ग्रौदारिकगरीर-वैऋियिक शरीर-तैजसशरीर और कार्मणशरीर; अथवा औदारिकशरीर-ग्राहारकशरीर-तैजस शरीर-कार्मरण शरीर; इनके साथ विद्यमान चार शरीर वाले जीव होते हैं।'
__ योगमार्गरणा के अनुवाद से पांचों मनोयोगो, पाँचों वचनयोगी और औदारिक काययोगी जीव तीन शरीर वाले और चार शरीर वाले होते हैं ।
शङ्का-उत्तर शरीर की बिक्रिया करने वाले जीवों के औदारिक काययोग कैसे सम्भव है ? समाधान नहीं, क्योंकि उत्तर शरीर भी औदारिककाय है ।
शङ्खा-औदारिक शरीर नामकर्म के उदय से उत्पन्न हुए विक्रिया स्वरूप शरीर का औदारिकपना नहीं रहता?
समाधान—यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि ऐसा होने में विरोध प्राता है।'
परन्तु विवक्षावश अन्यत्र ऐसा भी कहा है कि यह विबिया रूप शरीर भी औदारिक है, हेसा कहना ठीक नहीं है, क्योंकि बिक्रिया रूप शरीर को औदारिक होने का निषध है । वैक्रियिकशरीर मामकर्म का उदीरणा काल जघन्य से एक समय मात्र है, क्योंकि तिर्यंचों या मनुष्यों में एक समय के लिए उत्तर शरीर को विक्रिया करके द्वितीय समय में मृत्यु को प्राप्त हुए जीव के एक समय काल पाया जाता है।' अग्निकायिक, वायुकायिका, बादर अग्निकायिक, बादरवायुकायिक, उनके पर्याप्त, सकायिक और सकायिक पर्याप्त जीवों में विक्रिया करनेवाले जीव होते हैं, इसलिए उनमें वैश्रियिक शरीर सम्भव है।
पाहारक काययोग और आहारक मिश्रयोग पाहारस्सुदयेण य पमत्तविरदस्स होवि पाहार । असंजमपरिहरराट्ट संदेहविरणासण्टुं च ॥२३५।। रिणयसेसे केवलिवुगविरहे रिपक्क मरणपहुदिकल्लाणे। परखेत्त संविते जिजिरणधरवंदरगट्ट च ॥२३६।। उत्तमअंगम्हि हवे धाबुबिहीणं सुहं असंहणणं । सुहसंठाणं धवलं हत्थपमाणं पसत्थुदयं ।।२३७।। प्रवाघादी अंतोमुहृत्तकालट्ठिदी जहप्पिणदरे । पज्जत्तीसंपुण्णे मरणंपि कदाचि सभवाइ ॥२३८।।
१. घबल पु. १४ पृ. २३८ । २. “जोगाणवादेण पंचमरण जोगी पंचवचि जोगी प्रोगलिय कायजोगी अत्धि जीवा तिसरीरा चदु सरीरा ॥१४४॥" [धवल पु. १४ पृ. २४२] । ३. धवल पु. १४ पृ. २४२-२४३ । ४. धवल पृ. १४ पृ. ४०२१ ५. श्रवल पु. १५ पृ. ६४ । ६. धवल पृ. १४ पृ. २४२ ।