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गाथा २१६
योगमार्गरणा/२८१
प्रत्येक शरीर राशि के अर्धच्छेद करने पर भी बादर तेजस्कायिक राशि उत्पन्न होती है। अथवा धनलोक के अर्धच्छेदों से अधिक अर्धच्छेदों के भाजित करने पर वहाँ जो लब्ध प्राबे उसे विरलित करके और उस विरलित राशि के प्रत्येक एक के प्रति धनलोक को देय रूप से देकर परस्पर गुणित करने पर जो राशि प्रावे उससे बादर वनस्पति अप्रतिष्ठित प्रत्येक शरीर जीवराशि के भाजित करने पर बादर तेजस्कायिक राशि पाती है। इसी प्रकार बादर निगोद प्रतिष्ठित प्रत्येक वनस्पति, बादर पृथिवीकायिक, बादर प्रकायिक और बादर वायुकायिक जीवों के अपने-अपने अर्धच्छेदों से बादर तेजस्कायिक राशि उत्पन्न कर लेनी चाहिए।
बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर जीवराशि के अर्धच्छेदों को विलित करके और उस विरलित राशि के प्रत्येक एक को दो रूप करके परस्पर गुणित करने पर बादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर जीव राशि उत्पन्न होती है। अथवा घनलोक के अर्घच्छेदों से बादर वनस्पतिकायिक अप्रतिष्ठित प्रत्येकशरीर राशि के अर्धच्छेदों के भाजित करने पर जो लब्ध प्राप्त हो, उसको विरलित करके और उस विरलित राशि के प्रत्येक एक-एक के प्रति घनलोक को देय रूप से देकर परस्पर गुणित करने पर बादर वनस्पतिकायिक अप्रतिष्ठित प्रत्येकशरीर राशि उत्पन्न होती है। बादर तेजस्कायिक राशि से बादर वनस्पति अप्रतिष्ठित प्रत्येक शरीर राशि के उत्पन्न करने पर अधिक अर्धच्छेद प्रमाण बादर तेजस्कायिक राशि के दुगुरिणत-दुगुणित करने पर बादर वनस्पतिकायिक अप्रतिष्ठित प्रत्येक शरीर जीव राशि उत्पन्न होती है। अथवा-अधिक अर्धच्छेदों को विलित करके और उस विरलित राशि के प्रत्येक एक को दो रूप करके परस्पर गुणा करने से जो राशि उत्पन्न हो, उससे बादर तेजस्कायिक राशि को गुणित करने पर बादर वनस्पतिकायिक अप्रतिष्ठित प्रत्येक शरीर जीवराशि होती है। अथवा अधिक अर्धच्छेदों को घनलोक के अर्धच्छेदों से भाजित करके जो लब्ध पावे उसे विरलित करके और उस विरलित राशि के प्रत्येक एक-एक के प्रति घनलोक को देयरूप से देकर परस्पर गुणित करने से जो राशि उत्पन्न हो उनसे बादर तेजस्कायिक जीवराशि को गुणित करने पर बादर वनस्पति अप्रतिष्ठित प्रत्येकशरीर जीवराशि उत्पन्न होती है। बादर निगोद प्रतिष्ठित प्रत्येक शरीर वनस्पति, बादर पृथिबीकायिक, बादर अप्कायिक और बादर वायुकायिक जीवराशि के प्रमाण से बादर वनस्पतिकायिक, अप्रतिष्ठित प्रत्येकशरीर राशि के उत्पन्न करने पर जिस प्रकार इन राशियों से तेजस्कायिक जीवराशि उत्पन्न की मई, उसी प्रकार उत्पन्न करनी चाहिए। बादर निगोद प्रतिष्ठित प्रत्येक शरीर वनस्पतिकायिक, बादर पृथिवी कायिक, वादर प्रकायिक और बादर वायुकायिक की इसी प्रकार प्ररूपरणा करनी चाहिए।
इस प्रकार गोम्मटमार जीवकाण्ड में कायमार्गणा नामक पाठवा अधिकार पूर्ण हुषा।
९. योगमार्गणाधिकार
योग का सामान्य लक्षण पुग्गलविवाइदेहोदयेप मरावयणकायजुत्तस्स । जीवस्स जा हु सत्ती कम्मागमकारणं जोगी ॥२१६।।