________________
गाथा २१३-२१५
कायगार्गणा/२८७
क्षेत्र की अपेक्षा त्रसकायिकों द्वारा सूच्यंगल के असंख्यातवे भाग के वर्ग म्हप प्रतिभाग से और इसकायिक पर्याप्तकों के द्वारा सूच्यंगुल के संख्यातवें भाग के वर्गरूप प्रतिभाग से जगत्प्रतर अपहुत होता है।'
इस सूत्र द्वारा कथित अर्थ को स्पष्ट करने के लिए विकलेन्द्रिय व पंचेन्द्रिय जीवों का तथा उनके पर्याप्त व अपर्याप्त जीवों का प्रमाण लाने के लिए अबहार कालों का (भागाहारों का) कथन किया जाता है।
पावली के असंख्यातवें भाग से सुच्यंगुल को भाजित करने पर जो लब्ध आवे उसको वर्गित करने पर द्वीन्द्रिय जीवों का अवहार काल होता है। द्वीन्द्रियों के अवहारकाल को प्राबली के असंख्यातवें भाग से भाजित करने पर जो लब्ध आबे उसे उसो द्वीन्द्रियों के अवहारकाल में मिला देने पर द्वीन्द्रिय अपर्याप्त जीवों का अवहारकाल होता है। इसी द्वीन्द्रिय अपर्याप्तकों के अबहारकाल को प्रावली के असंख्यातवें भाग से भाजित करने पर जो लब्ध प्रावे उसे उसी द्वीन्द्रिय अपर्याप्त अवहारकाल में मिला देने पर त्रीन्द्रिय जीवों का अवहारकाल होता है । पुनः इस श्रीन्द्रिय जीवों के अवहारकाल को प्रावली के असंख्यातवें भाग से भाजित करने पर जो लब्ध आबे, उसे उसी त्रीन्द्रिय जीवों के वहारकाल में मिला देने पर प्रोन्द्रिय अपर्याप्तकों का अवहारकाल होता है। इसी प्रकार चतुरिन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय अपर्याप्त; पंचेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों के अवहारकाल को ऋम से प्रावली के असंख्यातवें भाग से खण्डित करके उत्तरोत्तर एक-एक भाग से अधिक करना चाहिए। अनन्तर पंचेन्द्रिय अपर्याप्त जीवों के अवहारकाल को प्रावली के असंख्यातवें भाग से गणित करने पर प्रतरांगुल के संध्यातवें भाग प्रमाण त्रीन्द्रिय पर्याप्त जीवों का अवहारकाल होता है। इसे आवली के असंख्यातवें भाग से भाजित करने पर जो लब्ध पावे उसे उसी त्रीन्द्रिय पर्याप्तकों के अवहारकाल में मिला देने पर द्वीन्द्रिय पर्याप्त जीवों का अवहारकाल होता है । इस द्वीन्द्रिय पर्याप्तकों के अबहारकाल को प्रावली के असंख्यातब भाग से भाजित करने पर जो लब्ध आवे उसे उसी द्वीन्द्रिय पर्याप्त प्रवहार काल में मिला देने पर पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीवों का अवहार काल होता है। इस पचेन्द्रिय पर्याप्त जीवों के प्रवहारकाल को प्रावली के असंख्यातवें भाग से भाजित कर देने पर जो लब्ध प्रावे उसे उसी पंचेन्द्रिय पर्याप्त अवहारकाल में मिला देने पर चतुरिन्द्रिय पर्याप्त जीवों का प्रवहारकाल होता है। यहाँ सर्वत्र राशि विशेष से राशि को अपतित करके जो लब्ध प्रावे उसमें से एक कम करके भागहार रूप प्रावली का असंख्यातवें भाग उत्पन्न कर लेना चाहिए। इन अवहार कालों में से पृथक्-पृथक जगत्प्रतर को भाजित करने पर अपने-अपने द्रव्य का प्रमाण आता है।
प्रावलिप्रसंखभागेगवहिद-पल्लूपसायरछिदा । बादरतेपरिणभूजलवादाणं चरिमसायरं पुण्णं ॥२१३।। तेवि विसेसेरणहिया पल्लासंखेज्जभागमेत्तेण । तम्हा ते रासीमो असंखलोगेण गुरिणवकमा ।।२१४॥ दिण्णच्छेदेणव हिंदट्टच्छेदेहि पयदविरलणं भजिये।
लद्धमिदइटरासीरमरणोपहदीए होदि पयदधणं ॥२१५।। १. धवल पु. : पृ. ३६१ सूत्र १७०। २. धवल पु. ३ पृ. ३१५-३१६ । ३. घबल पु. ३, पृ. ३१५-१६ ।