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________________ गाथा २११ कायमार्गणा: २८५ गाथार्थ-धनावली के असंख्यातवें भाग प्रमाण यादर अग्निकायिक पर्याप्त जीव हैं और लोक के संख्यातवें भाग प्रमाण बादर वायुकायिक पर्याप्त जीब हैं। अपनी-अपनी संपूर्ण बादर पर्याप्त राशि में से बादर पर्याप्तों का प्रमाण घटाने पर बादर अपर्याप्तकों का प्रमाण प्राप्त होता है ।।२१०॥ विशेषार्थ –बादर तेजस्कायिक पर्याप्त जीव द्रव्य प्रमाण की अपेक्षा असंख्यात हैं जो असंख्यात प्रावलियों के वर्गरूप है किन्तु पावली के धन के भीतर हैं अर्थात् घनावली से हीन है। प्रावली के असंख्यातवें भाग से प्रतरावली को भाजित करके जो लब्ध पावे, उससे प्रतरावली के उपरिम वर्ग को भाजित करने पर बादर तेजस्कायिक पर्याप्त राशि होती है। यह असंख्यात प्रतराबली प्रमाण है। इसका स्पष्टीकरण :--प्रतरावली का उसी के उपरिम वर्ग में भाग देने पर प्रतरावली का प्रमाण पाता है। प्रनगवली के द्वितीय भाग का प्रन रावली के उपरिम वर्ग में भाग देने पर दो प्रतराबनियाँ लब्ध पाती हैं। प्रतरावली के तृतीय भाग का प्रतराबली के उपरिम वर्ग में भाग देने पर तीन प्रतरावलियां लब्ध पाती हैं। इसी प्रकार नीचे जाकर पावली के असंख्यात भाग से प्रतरावली को खण्डित करके जो लब्ध प्रावे (प्रतरावली का असंख्यातवाँ भाग) उसका प्रतरावली के उपरिम वर्ग में भाग देने पर प्रसंस्थान प्रतानियां लध माती है। इतना धादर तेजस्कायिक पर्याप्त जीवों का प्रमाण है।' प्रावलियाए बग्गो प्रायलियासंखभागगुरिणदो दु। तह्मा घणस्स अंतो बादरपज्जत्ततेऊणं ॥७७॥ -च कि प्रावली के असंख्यातवें भाग से प्रावली के बर्ग को गुगित कर देने पर बादर तेजस्कायिक पर्याप्त राशि का प्रमाण होता है, इसलिए वह प्रमाण घनावली के भीतर है। बादर वायुकायिक पर्याप्त जीव क्षेत्र की अपेक्षा असंख्यात जगत्प्रतर प्रमाण हैं जो लोक के संख्यातवें भाग है । संख्यात से घनलोक को भाजित करने पर बादर वायुकायिक पर्याप्त जीवों का प्रमाण प्राप्त होता है। जगसेढीए वम्मो जगसेटीसंखभागगुणिदो दु। तहमा घणलोगंतो बावरपज्जत्तवाऊणं ॥७॥ ---जगच्छ्रेणी के वर्ग को जगन्छेणी के संख्यातवें भाग से गुणित करने पर बादर वायुकायिक पर्याप्ति राशि पाती है। इसलिए उक्त प्रमाण घनलोक के भीतर प्राता है । साहारणबादरेसु असंखं भागं असंखगा भागा। पुण्णाणमपुण्णाणं परिमाणं होदि अणुकमसो ॥२११॥ गाथार्थ – साधारण बादर जीवों में असंख्यातवें भाग तो पर्याप्त जीव हैं और असंख्यात बहुभाग अपर्याप्त जीवों का प्रमाण है ।।२११।। विशेषार्थ-वादरनिगोद पर्याप्त जीव सबसे स्नोक हैं। बादरनिगोद अपर्याप्त जीव असंख्यात १. धवल पु. ३ पृ. २५० सूत्र ६१ व. २५१ । २. धवल पू. ३ पृ. ३५५ । ३. बवल पू. ३. ३५५ मुत्र ९४ | ४. श्रवल पु. ३ पृ. ३५६ । ५. धवल पु. ३ पृ. ३५६ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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