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________________ गाथा १५१ कामा / २५१ गाथार्थ -- जाति नामकर्म के अविनाभावी बस व स्थावर नामकर्मोदय से काय होती है। वह जिनमत में पृथ्वीकाय आदि के भेद से छह प्रकार की कही गई है ।।१५१|| विशेषार्थ जाति नाम के साथ बिनाभावी पण रखने हा बस व स्थावर नामकर्म है । उस के उदय से उत्पन्न हुई मात्मा की त्रसरूप व स्थावररूप पर्याय काय है, ऐसा सर्वज्ञ वीतराग के मत में कहा गया है। त्रस जीव है अथवा स्थावर जीव है सो काय है । ऐसा व्यवहार होता है, कहा जाता है । उद्वेगजनित क्रियावाला त्रस और स्थितिक्रियावाला स्थावर यह लक्षण निरुक्ति से सिद्ध हो सकता है। जो पुद्गलस्कन्धों के द्वारा संचित किया जाता है, वह काय है जैसे औदारिक आदि शरीर । शरीर में स्थित श्रात्मा भी उपचार से काय है। जीवविपाकी जाति नामकर्म अस व स्थावर नामकर्म का कार्य होने से जोव की पर्याय ही काय है, ऐसा व्यवहार होता है। पुद्गलविपाकी शरीर नामकर्म वा कार्य होने से शरीर भी काय शब्द से ग्रहण किया जाता है । वह काय पृथ्वी, अप् तेज, वायु, वनस्पति और त्रस के भेद से छह प्रकार की है। I जो संचित किया जाता है, वह काय है । ईट आदि के संचय के साथ व्यभिचारदोष भी नहीं आता है, क्योंकि पृथ्वी आदि कर्मोदय से' इतना विशेषण लगा लेना चाहिए । शंका- पुद्गलविपाकी औदारिक आदि शरीर नामकर्मोदय से जो संचित किया जाता है, वह काय है, ऐसी व्याख्या क्यों नहीं की गई ? समाधान - ऐसा नहीं है, क्योंकि सहकारी रूप पृथिवी श्रादि नाम कर्मोदय के प्रभाव में केवल श्रदारिक आदि शरीर नामकर्मोदय से नोकर्म वर्गणाओं का संचय नहीं हो सकता । शङ्का - कार्मणकाययोग में स्थित जीव के पृथिवी श्रादि के द्वारा संचित हुए नोकर्म पुद्गल का प्रभाव होने से कायपना प्राप्त हो जाएगा ? " समाधान - ऐसा नहीं समझना चाहिए, क्योंकि नोकर्मरूप पुद्गलों के संचय का कारण पृथिवी आदि कर्म सहकृत श्रीदारिक आदि नामकर्म का सत्व कार्मर काययोग रूप अवस्था में भी पाया जाता है, इसलिए उस अवस्था में भी कायपने का व्यवहार बन जाता है । अथवा योगरूप आत्मा की प्रवृत्ति से संचित हुए प्रौदारिक आदि रूप पुद्गल पिण्ड काय हैं । शङ्का - काय का इस प्रकार लक्षण करने पर भी पहले जो दोष दिया गया है, वह दूर नहीं होता । अर्थात् इस प्रकार भी जीव के कार्मणकाययोग अवस्था में अकायपने की प्राप्ति होती है । धन-ऐसा नहीं है, क्योंकि योगरूप आत्म-प्रवृत्ति से संचित हुए कर्म रूप पुद्गल पिण्ड का कार्य काययोग अवस्था में सद्भाव पाया जाता है । श्रर्थात् जिस समय आत्मा कार्मण काययोग की अवस्था में होता है, उस समय उसके ज्ञानावरणादि आठ कर्मों का सद्भाव रहता है, अतः उसके कायपना बन जाता है। १. सिद्धान्तचक्रवर्ती श्रीमदभव चन्द्रसूरि कृता टीका । २. धवल पु. १ पृ. १३२७-१३८ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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