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गाथा १७४
इन्द्रियमाणा / २४३
प्रदेशों को घ्राण-इन्द्रिय व्याप्त करती है। उससे प्रसंख्यातगुणे श्राकाशप्रदेशों में रसना इन्द्रिय रहती है और उससे संख्यात गुरणे अजघन्य स्पर्शन-इन्द्रिय के प्रकाशप्रदेश हैं । '
अनियि जीवों का कथन
रवि इंदिय-कररण- जुदा श्रवग्गहादोहिं गाया अथे । dr य इंदिय- सोषखा श्ररिंग दियारांत - खारख -- सुहा ॥ १७४॥ *
गाथार्थ - वे अनिन्द्रिय जीव इन्द्रिय रूप अर्थ को ग्रहण नहीं करते, उनके इन्द्रियसुख सुख अनिन्द्रिय है ।। १७४ ।।
कररण से युक्त नहीं हैं और श्रवग्रह आदि के द्वारा भी नहीं है, क्योंकि उनका अनन्त ज्ञान और अनन्त
विशेषार्थ - जिनके इन्द्रियाँ नहीं होतीं, वे अनिन्द्रिय जीव हैं ।
शङ्कर वे कौन हैं ?
समाधान- शरीररहित सिद्ध भगवान प्रतिन्द्रिय हैं ।
शङ्का- उन सिद्ध भगवान में भावेन्द्रिय और तज्जन्य उपयोग पाया जाता है, अतः वे इन्द्रिय सहित हैं
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समाधान- नहीं, क्योंकि क्षयोपशमजन्य उपयोग के इन्दियत्व है । परन्तु जिन के समस्त कर्म क्षीण हो गये हैं, ऐसे सिद्धों में क्षयोपशम नहीं होता, क्योंकि वह क्षायिक भाव के द्वारा दूर कर दिया जाता है।
शङ्का - प्रर्थ किसे कहते हैं ?
समाधान- 'जो जाना जाता है' वह ग्रंथ है । इस व्युत्पत्ति के अनुसार वर्तमान पर्याय में अर्थपर पाया जाता है।"
शंका यह व्युत्पत्त्यर्थं अनागत और अतीत पर्यायों में समान है ?
समाधान — नहीं, क्योंकि अनागत और यतीत पर्यायों का ग्रहण वर्तमान अर्थ के ग्रहणपूर्वक होता है । अर्थात् अतीत और अनागत पर्यायें भूतशक्ति और भविष्यत्शक्ति रूप से वर्तमान अर्थ में ही विद्यमान रहती हैं। यतः उनका ग्रहरण वर्तमान अर्थ के ग्रहणपूर्वक ही हो सकता है, इसलिए उन्हें अर्थ यह संज्ञा नहीं दीं जा सकती । केवलज्ञान आत्मा और अर्थ से अतिरिक्त किसी इन्द्रियादिक सहायक की अपेक्षा से रहित है ।
१. धवल पु. १ पु. २३५ । पृ. ५७७ पर गाथा ७२ है ४.
२. यह गाथा धवल पु. १ पृ. २४६ पर तथा प्राकृत पंत्र संग्रह ( ज्ञानपीठ) प्रा. पं. सं. पू. १५ परगा ७४ में कुछ शब्दभेद है। ३. वबल पु. १ पृ. २४८ । पृ. १ पृ. २४६ । ५. 'अपरिच्छिद्यते इति न्यायतस्तत्रार्थमोपलम्भात् । [ जयधवल पु. १
पृ. २२ ]; 'श्रर्यंत इत्यर्थ: निश्चीयत इत्यर्थः । ' [ सर्वार्थ सिद्धि १/२ ] । ६. जयधवल पु. १ पृ. २३ ।
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