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________________ म इन्द्रियमाणा / २३१ सन्निधान से श्रात्मा द्रव्येन्द्रिय की रचना में व्यापार करता है, ऐसे ज्ञानावरणकर्म के क्षयोपशम को लब्धि कहते हैं । क्षयोपशमरूप लब्धि के निमित्त 'आलम्बन से उत्पन्न होने वाले ग्रात्मपरिणाम को उपयोग कहते हैं ।' गाथा १९५ निर्वृत्ति और उपकरण, ये द्रव्येन्द्रिय के दो भेद हैं । २ रचना को निवृत्ति कहते हैं। यह रचना, कर्म करता है । निवृत्ति दो प्रकार की है - बाह्यनिवृत्ति और आभ्यन्तर - निर्वृत्ति । शङ्का -- बाह्यनिर्वृत्ति किसे कहते हैं समाधान --- इन्द्रिय संज्ञा को प्राप्त ग्रात्मप्रदेशों में प्रतिनियत आकाररूप और नामकर्म के उदय से श्रवस्था विशेष को प्राप्त पुद्गलप्रचय को बाह्यनिवृत्ति कहते हैं । शङ्का — श्राभ्यन्तरनिर्वृत्ति किसे कहते हैं । समाधान- प्रतिनियत चक्षु श्रादि इन्द्रियों के प्राकाररूप से परिशात हुए लोकप्रमाण यथवा उत्सेधागुल के असंख्यातवें भागप्रमाण आत्मप्रदेशों की रचना को श्राभ्यन्तर निवृत्ति कहते हैं । " जिसके द्वारा उनकार किया जाता है, अथवा जो निर्वृति का उपकार करता है वह उपकरण है । बाह्य और अभ्यन्तर के भेद से उपकरण भी दो प्रकार है। नेत्र की दोनों पलकें और नेत्ररोम आदि नेत्रेन्द्रिय के बाह्य उपकरण हैं । कृष्णमण्डल और शुक्ल मण्डल नेत्रेन्द्रिय के अभ्यन्तर- उपकरण हूँ । शङ्का - जिस प्रकार स्पर्शन-इन्द्रिय का क्षयोपशम सम्पूर्ण आत्मप्रदेशों में उत्पन्न होता है, उसो प्रकार चक्षु यादि इन्द्रियों का क्षयोपशम क्या सम्पूर्ण आत्मप्रदेशों में उत्पन्न होना है या प्रतिनियत आत्मप्रदेशों में ? आत्मा के सम्पूर्ण प्रदेशों में क्षयोपशम होता है; यह तो माना नहीं जा सकता, क्योंकि ऐसा मानने पर प्रात्मा के सम्पूर्ण अवयवों से रूपादिक की उपलब्धि का प्रसङ्ग मा जाएगा। यदि कहा जावे कि सम्पूर्ण अवयवों से रूपादिक की उपलब्धि होती ही है, सो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि सर्वाङ्ग से रूपादिक का ज्ञान होता हुआ पाया नहीं जाता। इसलिए सर्वाङ्ग में क्षयोपशम नहीं माना जा सकता है। यदि श्रात्मा के प्रतिनियत अवयवों में चक्षु आदि इन्द्रियों का क्षयोपशम माना जाए सो भी नहीं बनता, क्योंकि ऐसा मान लेने पर "आत्मप्रदेश चल भी हैं, अचल भी हैं और चलाचल भी हैं" इस प्रकार से वेबनाप्राभूत के सूत्र से श्रात्मप्रदेशों का भ्रमण अवगत हो जाने पर जीवप्रदेशों की भ्रमरूप अवस्था में सम्पूर्ण जीवों को अन्धेपने का प्रसङ्ग आ जाएगा ? समाधान -- यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि जीवों के सम्पूर्ण श्रात्मप्रदेशों में क्षयोपशम की उत्पत्ति स्वीकार की गई है. परन्तु ऐसा मान लेने पर भी जीव के सम्पूर्ण श्रात्मप्रदेशों द्वारा रूपादि की उपलब्धि का प्रसङ्ग भी नहीं आता है, क्योंकि रूपादि के ग्रहण करने में सहकारी कारणरूप बाह्य जीव के सम्पूर्ण आत्मप्रदेशों में नहीं पाई जाती है । ' १. व.पु. १ पृ. की टीका | २३६ । २. त. सू. श्र. २ सू. १७ । ३. स. सि. प्र. २ सु. १७ की टीका । ४. स. सि. २/१७ ५. ध. पु. १२.३६७-६८ सूत्र ५-७ एवं धवल १३ / २६६ | गो. श्री. ग. ५६२; त. रा. बा. घ. ५ सु. ८ वा. १४ । ६. ष. पु. १ पृ. २३२-३३ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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