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________________ गाथा १५७-१५६ कटप पुरस्थवर्णनं वनवपंचाष्टकल्पितः क्रमशः । स्वर अन शून्यं संख्या मात्रोपरिमाक्षरं त्याज्यम् ॥' गतिमा गंगा/ २२३ अर्थ - क, स्व आदि अक्षरों से ( क ख ग घ ङ च छ ज झ ) क्रमश: १, २, ३, ४५, ६, ७, ८, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध से क्रमश: १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८, ६ प फ ब भ म से क्रमश: १, २, ३, ४ १ य, र, ल, व, स ह से कम श्रद्धों का ग्रहण करना चाहिए। स्वर त्र और न शून्य के सूचक हैं । को छोड़ देना चाहिए, क्योंकि इनसे किसी प्रक का बोध नहीं होता । १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८ मात्रा और उपरम अक्षरों मनुष्य पर्याप्त जीवराशि पाँचवें वर्ग (बादल) के घनप्रमाण है, यह कथन युक्ति से घटित नहीं होता, क्योंकि "कोड़ाकोड़ाकोड़ी के ऊपर और कोड़ाकोड़ाकोड़ाकोड़ी के नीचे मनुष्यपर्याप्तराशि है" षट्खण्डागम के इस सूत्र के साथ उक्त कथन का विरोध आता है। पंचम वर्ग (बादल) का धन २६ अङ्क प्रमाण है, किन्तु एक के आगे २१ शून्य रखने से २२ अङ्क प्रमाण कोड़ाकोटाकोड़ी होती है और एक अंक के आगे २८ शुन्य रखने से २६ प्र प्रमाण कोड़ाकोड़ाकोड़ाकोड़ी होती है । परन्तु पंचम वर्ग के धन का प्रमाण २६ अंक प्रमाण होते हुए भी कोड़ाकोड़ाकोड़ाकोड़ी नामक इस संख्या से बढ़ जाता है। दूसरे, यदि बाबालरूप पंचमवर्ग के घनप्रमाण मनुष्य पर्याप्त राशि हो तो वह राशि मनुष्यक्षेत्र (६१६७०८४६६६६६४१६२०००००००० प्रतराङ्गल प्रमाण क्षेत्र) में समा जानी चाहिए ।' यदि ७६२२८१६२५१४२६४३३७५६३५४३६५०३३६ प्रमाण मनुष्यपर्याप्त जीवराणि को संख्यात प्रतराङ्गल से गुणा क्रिया जावे तो उस प्रमाण को मनुष्यक्षेत्र से संख्यातगुणे का प्रसङ्ग प्रा जाएगा। शङ्का - मनुष्यक्षेत्र का क्षेत्रफल तो प्रमाणप्रतराङ्गल से प्राप्त किया है, उसमें संख्यात उत्सेभाङ्गलमात्र श्रवगाहना से युक्त मनुष्यपर्याप्तराशि कैसे समा जाएगी ? समाधान - ऐसी शङ्का ठीक नहीं, क्योंकि सबसे उत्कृष्ट अवगाहना से युक्त (३ कोस ) मनुष्यपर्याप्त राशि में संख्यानप्रमाण- प्रतराङ्गलमात्र अवगाहना के गुणकार स्वरूप मुख विस्तार पाया जाता है । उसी प्रकार मनुष्यपर्याप्त राशि से संख्यातगुणे सर्वार्थसिद्धि के देवों की भी जम्बूद्वीप प्रमाण सर्वार्थसिद्धि के विमान में रहने के लिए अवकाश नहीं बन सकता, क्योंकि सर्वार्थसिद्धि विमान के क्षेत्रफल से संख्यातगुणी अवगाहना से युक्त देवों का वहाँ अवस्थान मानने में विरोध प्राता है, अतः 'मनुष्यपर्याप्त राशि एककोड़ाकोड़ाकोड़ी से अधिक है, ऐसा ग्रहण करना चाहिए। पर्याप्त मनुष्यराशि के चार भागों में से तीन भाग प्रमाण मनुष्यिनियाँ हैं और एक चतुर्थांश पुरुष व नपुंसक राशि है। 'मनुष्यिती' शब्द से द्रव्यस्त्री अर्थात् महिलाओं का ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि द्रव्यस्त्री वस्त्र का त्याग नहीं कर सकती और वस्त्र असंयम का अविनाभावी है | इसलिए द्रव्य स्त्रियों के संयमासंयम रूप पञ्चम गुणस्थान ही हो सकता है, संयम नहीं हो सकता, किन्तु मनुष्यनियों के संयम भी हो सकता है । १. गो. जी का. गा. १५८ की सम्यग्ज्ञानचन्द्रिका टोका | २. ध. पु. ३ पृ. २५.५ । ३. श्र. पु. ३ पृ. १५८ । ४. व. पु. ७ पृ. २५६
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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