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२२२/गो. सा. जीवकाण्ड
गाथा १५७-१५६ असंख्यातासंख्यात अवसर्पिणी-उत्सपिणियों ने अपहृत होते हैं । ' सूच्यंगुल के प्रथमवर्गभूल को उसके तृतीय वर्गभूल से गुणित करके जगच्छ्रेणी को भाग देने से एक अधिक मनुष्य राशि का प्रमाण प्राप्त होता है। एक कम कर देने से मनुष्यों की संख्या प्राप्त होती है ।
शा-एक कम किसलिए किया गया है ?
समाधान--चूकि जगच्छणी कृतयुग्म राशिरूप है और मनुष्यराशि तेजोज है, अतः मनुष्यराशि में एक प्रक्षेप करके ज.श्रे. को भाग देने पर सूच्याङ्ग ल का प्रथमवर्गमूल गुणित तृतीयवर्गमूल प्राप्त होता है।
शङ्कर-'कृतयुग्म' और 'तेजोज कौनसी राशि हैं ?
समाधान-जो राशि चार से अपहत होती है वह कृतयुग्मराशि है। जिस राशि को चार से अपहृत करने पर तीन अङ्क शेष रहते हैं वह तेजोजराशि है। कहा भी है
___ चोहस बादरम्म सोलस कदजुम्मेरथ कलियोजो।
तेरस सेजोजो खलु पण्णरसेवं व विष्णेया ।।३।। अर्थ-चौदह को बादरयुग्म, सोलह को कृतयुग्म, तेरह को कलिलोज और पन्द्रह को तेजोज राशि जानना चाहिए।
तेजोजराशि में एक प्रक्षिप्त करने से कृतयुग्म राशि हो जाती है। जैसे.-१५ तेजोजराशि में १ मिलाने से (१५ + १) १६ कृतयुग्मराशि हो जाती है, जिसके द्वारा कृतयुग्म ज.श्रे. विभाजित हो जाती है।
___ज.श्रे. को सूच्यंगुल के प्रथमवर्गगूल व तृतीयवर्गमूल से विभक्त करने पर ज.श्रे. का प्रमाण असंख्यातयोजन कोटि रह जाता है। इस प्रकार सामान्य मनुष्य राशि का प्रमाण मध्यम असंख्यातासंख्यात सिद्ध हो जाता है ।
कोडाकोड़ाकोड़ी के ऊपर और कोड़ाकोड़ाकोड़ी के नीचे अर्थात् द्विरुपवर्गधारा में छठे वर्ग से ऊपर और सातवें वर्ग से नोचे, इनके बीच की संख्या प्रमाण मनुष्य पयप्ति हैं। यद्यपि यह सामान्य कथन है, तथापि प्राचार्य परम्परागत गुरूपदेश से पंचम वर्ग के घनप्रमाण (पंचमवर्गx पंचमवर्गx पंचमवर्ग-षष्ठवर्गxपंचमवर्ग) मनुष्य पर्याप्तराशि है ।
__तकारादि अक्षरों में से किस अक्षर के द्वारा कौन-सी संख्या ग्रहण की जाती है उसके लिए निम्नलिखित श्लोक जानना
१. "असंखेज्जासंखेज्जाहि ओसप्पिणि-उस्सप्पिणीहि अहिरंति कालेण" प.पु. ७ पृ. २५५ सूत्र २४ । २. "मणुसमाणुस अपज्जतएहि रूचं रूवापक्लित्तएहि सेडी अबाहिरदि अंगुलबम्गमूले तदियश्वम्ममूलगुरिणदेरण" ध.पु. ७ पृ. २५६ सूत्र २७ । ३. "जो रासी चदुहि पहिरिज्जदि सो कदजुम्मो। जो तिगम्मो सो तेजोजो।" घ. पु. १० पृ. २२-२३ । ४. प. पु. १० पृ. २३ । ५. "तिस्से मेडीए प्रायामो असंवेज्जायो जोवराकोडीम्रो" घ. पु. ७ पृ. २५६ सूत्र २७ । ६. "मणुसपजत्ता दब्दपमाणेण कोडाकोडाकोडीए उरि कोडा कोडाकोलाकोडीए हेटदो छण्हवरगारगमुवरि सत्तण्हं वग्गाएं हेलदो" ध. पु. ७ पृ. २५७; ध. पु. ३ पृ. २५३ ।।