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________________ गाथा १५२ गतिमार्गगणा/२१३ में तथा धवल पु. १ सूत्र २४ में सिद्धों के साथ 'गति' शब्द का प्रयोग उपचार से किया गया है नथापि गा. १४६ में तथा धवल पु. १ पृ. १३४-३५ पर गति का जो लक्षण दिया गया है उससे सिद्धों का निराकरण हो जाता है, क्योंकि सिद्धों के गति नामझाम का उदय नहीं है । ध. पु. १ पृ. १३४ पर तो इस विषय को स्पष्ट करते हुए कहा है कि-गति का ऐसा लक्षण करने से सिद्धों के साथ अतिव्यापित दोष भी नहीं पाता, क्योंकि सिखों के द्वारा प्राप्त करने योग्य गुरणों का अभाव है।" गति नामकर्मोदय के अभाव के कारण सिद्धगति प्रगति कहलाती है, अथवा एक भव से दूसरे भव में संक्रान्ति का नाम गति है और सिद्धगति असंक्रान्तिरूप है ।' कर्म के वश से भव-भव में अपने शरीरपर्याय की उतात्ति होना जन्म है। इस प्रकार उत्पन्न हुई शरीर-पर्याय का बयरूप हानि के द्वारा शीर्ण होना बुद्धता है। अपनी आयु का क्षय हो जाने के कारण इस शरीरपर्याय का व प्राणों का त्याग सो मरण है। अनर्थ की आशंका के कारण अपकारक पदार्थों से भाग जाने की इच्छा सो भय है। क्लेश के कारणभूत अनिष्ट द्रव्यों का संगम सो संयोग है। सुख के कारणभूत इष्ट द्रव्यों का नाश सो वियोग है। इनसे उत्पन्न हुआ आत्मा का निग्रह सो दुःख है। शेष तीन माहार, मेथुन व परिग्रह की वांछा सो संज्ञा है। रोग, मानभंग, वध, बन्धन आदि की वेदना जिस गति में नहीं है और न उत्पन्न होती है, वह सिद्धगति है। क्योंकि इनकी उत्पत्ति के कारगभूत कर्मों का भय हो गया है । परनन्त जान-दर्शन-मुख-वीर्यादि अपने स्वाभाविक गुणों की उपलब्धिरूप सिद्धपर्याय है। इस सिद्भगति की प्राप्ति उस जीव को होती है जिसने परम प्रकृष्ट रत्नत्रय से परिगात होकर शुक्लध्यान विशेष से उत्पन्न हुए संवर निर्जरा के द्वारा समस्त कर्मों का क्षय करके अपनी मुक्तावस्था प्राप्त कर ली है और स्वाभाविक ऊर्ध्वगमन के द्वारा लोक का अग्रभाग प्राप्त कर लिया है, ऐसी सिद्धपरमेष्ठी पर्यायरूप सिद्धगति होती है । आत्मस्वरूप की प्राप्ति अर्थात् अपने सम्पूर्ण गुणों से यात्मस्वरूप में स्थित होना सिद्धि है। ऐसे सिद्धि स्वरूप की गति सिद्ध गति है । ३ सिद्ध, निष्ठित, निष्पन्न, कृतकृत्य और सिद्धसाध्य ये एकार्थवाची नाम हैं । जिन्होंने समस्त कर्मों का निराकरण कर दिया है, वाह्य पदार्थों की अपेक्षा रहित-अनन्तअनुपम-स्वाभाविक और प्रतिपक्ष रहित ऐसे सुख को जिन्होंने प्राप्त कर लिया है, जो निलेप हैं, अचलस्वरूप को प्राप्त हैं, सम्पूर्ण अवगुणों से रहित हैं, सर्वगुरणों के निधान हैं, जिनका स्वदेह अर्थात प्रात्मा का प्राकार चरमशरीर से कुछ न्यून है और जो लोक के अग्रभाग में विराजमान हैं वे सिद्ध हैं। माण्डलिक मत बाले यह मानते हैं कि जीव का ऊर्ध्वगमन स्वभाव होने के कारगा प्राकाश में ऊपर-ऊपर चले जा रहे हैं, कहीं पर भी ठहरते नहीं। कर्मो का अभाव हो जाने के कारण ऊ बंगमन स्वभाव में कोई बाधा डालने वाला नहीं रहा । आचार्य कहते हैं कि कार्य की सिद्धि अन्न रंग और बहिरंग दोनों कारणों से होती है । धर्मद्रव्य बाह्य (निमित्त) कारण और ऊबंगमन स्वभाव अन्तरंग (उपादान) कारण हैं । लोकाकाण के अन्त तक हो धर्मद्रव्य का सद्भाव है। उससे आगे धर्मद्रव्य का अभाव है । अतः निमित्तकारण (धर्मद्रव्य) के प्रभाव के कारण सिद्ध भगवान में कार्वगमन १. “गदिकम्मोदयाभावासिद्धि गदो अगदी । अथवा भवाद्भवसंक्रान्तिर्गतिः प्रक्रान्तिः सिद्धगतिः । (ध.पु. ७ पृ. ६)। २. "मिपरमेष्ठी पर्यायका सिद्धिति भवति ।" सिद्धान्त चक्रवर्ती श्रीमदभय चन्द्रसरि कृत टीका । ३. ध. पु १ 2. २०३ । ४. ध. पु. १ पृ. २००। ५. "धर्मास्तिकायाभावात्' (त सू. प्र. १० मूत्र ) ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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