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१६८/मो. सा. जीवकाण्ड
गाथा १४७
गाथार्थ-गति कर्मोदय जनित पर्याय 'गति' है अथवा चारों गतियों में गमन करने के कारण को गति कहते हैं। नरक, तिर्यंच, मनुष्य और देव इस प्रकार बह गति चार प्रकार की है ।।१४६।।
विशेषार्थ–जहाँ को गमन किया जाय वह गति है।'
शङ्का-गति का इस प्रकार निरुक्ति अर्थ करने पर तो प्राम, नगर, खेट, कर्वट आदि स्थानों को भी गति मानने का प्रसंग पाता है ?
समाधान नहीं पाता, क्योंकि रूढ़ि के बल से गति नामकर्म द्वारा जो पर्याय निष्पन्न की जाती है उसमें गति शब्द का प्रयोग किया जाता है। गति नामकर्म के उदयाभाव के कारण सिद्धगति प्रगति कहलाती है।
अथवा एक भव से दूसरे भव में संक्रान्ति गति है। और सिद्धगति प्रसंक्रान्ति रूप है। कहा भी है
गह-कम्म-विरिणवत्ता जा चेट्टा सा गई मुणेयव्या।
जीवा हु साउरंगं गच्छंति त्ति य गई होइ ॥४॥ गति कम से जो चेष्टा विनिवृत्त की जाती है उसको गति जानना चाहिए अथवा जिसके निमित्त से चतुर्गति में जाते हैं, वह गति है।
नरकगति, प्रियंगति, मनुष्यगति, देवगति के भेद से वह गति चार प्रकार की है।
नरकगति का स्वरूप "ण रमंति जदो णिचं, दव्वे खेत्ते य काल-भाये य ।
अण्णोहि य जह्मा, तह्मा ते गारया भरिगया ॥१४७॥ गाथार्थ- जिस कारण से द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव में जो स्वयं तथा परस्पर में कभी प्रीति भाव को प्राप्त नहीं होते इसलिए वे भारत (नारक) कहे जाते हैं ।।१४।।
विशेषार्थ-व्रव्य-खाद्य व पेय पदार्थ । क्षेत्र-बिल आदि स्थान । काल-ऋतु प्रादि काल । भाव-संक्लेशरूप भाव। जो इनमें तथा एक दूसरे में रत नहीं हैं, जो हिंसादिक असमीचीन कार्यों में व्यापृत हैं उन्हें निरत कहते हैं और उनकी गति को निरतगति कहते हैं। अथवा जो नर अर्थात प्राणियों को काता (पीड़ा) देता है, पीसता है वह नरक है। नरक यह एक कर्म है। इससे जिनकी उत्पत्ति होती है वे नारक हैं और उनकी गति नारकगति है। अथवा जिस गति का उदय सम्पूर्ण अशुभ कर्मों के उदय का सहकारी कारण है वह नरकगति है। जो परस्पर में प्रीति नहीं रखते हैं वे नरत हैं और उनकी गति नरतगति है ।
१. "गम्यत इति गतिः" (ध. पु. ७ पृ. ६ ; मूलाचार अ. १२ पृ. २७६) । २. "प्रथवा भवाद् भवसक्रांतिर्गतिः" (ध. पु. ७ पृ. ६ मूलाचार पर्याप्ति अधिकार मा. १५६ टीका पृ. २७६)। ३. श्र. पु. १ पृ. १३५, प्रा. पं. सं. गा. ६० पृ. ५७६ । ४. “सा चर्षिया नरकगतितिर्यग्गतिमनुष्यगतिदेवतिभेदेन ।" (मूलाधार म. १२ गा. १५६ की टीका)। ५. प.पु. १ पृ. १०२;प्रा.पं. सं(ज्ञानपीठ) अ. १ गा. ६० पृ. १३। ६. प. पु. १ पृ. २०३ ।