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________________ शुद्धिपत्र অবিন प्रशुद्ध शुद्ध ... भक्ति प्रादि तत्त्वों को चनें, यह निमित्त है। साक्षात् प्रत्यक्ष हेतु मोहनीय कर्म गुणस्थान योग के सद्भाव प्रश्रद्धान प्रमत्तसंयत व अप्रमत्तसंयत अर्थात् सूत्र में विवक्षित नय वेदकसम्यक्त्व सहानवस्था ४३६-६३७ ८००-५५ ५८६-६३७ २५०-२६४ भक्ति एवं अणुनत महावत प्रादि तत्त्वों के बनें । यह साक्षात् हेतु दर्शनमोहनीय कर्म गगास्थान सद्भाव प्रद्धान प्रमत्तसंयत अर्थात् परमागम में मुख्य वेदक सम्याष्टि महानवस्था १४ कोठा नं. १ ४३६-६३० ६ कोठा न. ५ ८००.८८५ १२ कोठा न. ४ ५८५-६३७ २० कोठा नं. ५ ३५०-२६४ (३६ से १४) इसी प्रथम समानता बन जाती है दसवें गुगाम्यान....पावश्यक है। में ही प्रथम जिस पुष्टि के का वेदक विभाग जीव या काययोग को करने वाला प्रकृति क्योंकि, पहले माग जीवों क्यों अपेक्षा वृद्धि जो पसंझी साधारण इसी प्रकार प्रथम एकता कही है ये तीनों पंक्तियां काटनी हैं। में ही क्रोध की प्रथम जिस कृष्टि का बेदन त्रिभाग जीब योग का उपदेश करने वाला प्रवृत्ति क्योंकि, पहले माग सभी जीवों क्योंकि अपेक्षा प्रथवा वृद्धि जो प्रसंज्ञी (?) साधारण जीव 1 २७ ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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