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________________ (७) गाथा २६५ पृ. ३६६ ) में प्रागत शब्द "प्रसंखभजिकमा " का विशेषार्थ में स्पष्टीकरण भुलवश नहीं हो पाया है। इसलिए इसका स्पष्टीकरण यहाँ किया जाता है जिला, पृथ्वी, धूलि तथा जल शक्ति की अपेक्षा ये ४ स्थान पृथक् पृथक् असंख्यात लोकप्रमाण भेदों वाले हैं । तथापि ये भेद यथाक्रम श्रसंख्यातगुणे हीन असंख्यातगुणेहीन हैं। यथा:समस्त कषाय उदयस्थान श्रसंख्यात लोक प्रमाण होते हैं । तथापि उत्कृष्ट स्थान से प्रारम्भ कर जघन्य स्थान पर्यन्त क्रमशः असंख्यात गुणहीन-असंख्यात गुणहीन होते हैं। समस्त कषायोदय स्थानों को प्रसंख्यातलांक से भाजित करने पर बहुभाग मात्र शिलाभेद समान उत्कृष्ट शक्तियुक्त उदयस्थान होते हैं । पुनः शेष एक भाग को असंख्यात लोक से भाजित करके जो बहुभाग प्राप्त हो वे पृथ्वीभेद समान अनुत्कृष्ट शक्तियुक्त उदयस्थान होते हैं । पुनः शेष एक भाग को असंख्यात लोक से भाजित करने पर जो बहुभाग प्राप्त हो तत्प्रमाण धूलिरेखा समान प्रजघन्य शक्तियुक्त उदयस्थान होते हैं । पुनः अन्त में शेष बचे एक भाग मात्र उदयस्थान जलरेखा समान जघन्य शक्तियुक्त होते हैं। ये भी प्रख्यात लोक प्रमाण हैं | इस प्रकार ये चारों स्थान क्रमशः असंख्यातगुणेहीन-हीन होते हैं । प्रकार नायें शक्तिस्थानों में उदयस्थानों का प्रमाण कहा गया ( १०८ प्राचार्य अभयचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती) । O इस (८) गाथा ६४० के विशेषार्थ में पृ. ७०९ पर कहा है कि "अन्यथा तीसरी पृथ्वी से निकले हुए कृष्ण आदिकों के तीर्थंकरत्व नहीं बन सकता है", फिर लिखा है कि "तीर्थंकर प्रकृति की सत्ता के कारण स्वयं इतनी विशुद्धता आ जाती है कि वह स्वयं दर्शनमोह की क्षपणा कर सकता है।" इसका स्पष्टीकरण - रहस्य की बात यह है कि यह जीव तीर्थकर केवली, सामान्य केवली या श्रुत केवली के पादमूल में हो दर्शनमोह की क्षपा करता है । ( भवन ६ / २४६ ) ऐसी स्थिति में जो जीव तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध कर दूसरे-तीसरे नरक उत्पन्न होते हैं तथा फिर वहाँ से प्राकर मनुष्यों में उत्पन्न होते हैं, उनको क्षायिक सम्यक्त्व की प्राप्ति ऐसे होती है कि ऐसे तीर्थंकर सत्त्व वाले क्षायोपण सम्यक्त्वी चरम शरीरी मनुष्य स्वयं जिन अर्थात् श्रुतकेवली होकर फिर प्रन्य किसी की fafe के बिना, स्वयं ही दर्शनमाह की क्षपणा करने में समर्थ होते हैं । प्रस्ता. पू. १, मूल पृ. ४, जैनगजट १६.४७० ई. पू. ७) 1 ( जयधवल १३ श्रीकृष्णा ने श्री नेमिनाथ के समवसरण में तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध तो कर लिया था, किन्तु उनको क्षायिक सम्यक्त्व नहीं उत्पन्न हुआ था । सम्यक्त्व से पूर्व श्रीकृष्ण ने नरकायु का बन्ध कर लिया था. यतः वे मरकर तीसरे नरक में उत्पन्न हुए। वहाँ से क्षयोपशम सम्यक्त्व के साथ निकल कर तीर्थकर होंगे। अब यहाँ प्रश्न यह होता कि उनको क्षायिक सम्यक्त्व कैसे प्राप्त होगा ? इसके समाधान के लिए घबल में लिखा है कि जो स्वयं जिन अर्थात् श्रुतकेबली होते हैं, वे स्वयं दर्शनमोह की क्षपणा करते हैं, उनको ग्रन्य केवलो या श्रुतकेबलों के पादमूल की श्रावश्यकता नहीं रहती । श्रतः कृष्ण नरक से आकर मुनि बनकर, श्रुतकेवली (जिन) बनकर फिर स्वयं दर्शनमोह को क्षपणा ( बिना किसी के पादमूल मे गये) कर लेंगे। शेष सब सुगम है । वि. २५.१२.१६६२ विदुषाम् अनुचरः जवाहरलाल जैन सिद्धान्तशास्त्री
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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