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१७० /गो. सा. जीवकाण्ड
गाथा १२७
सूत्र में पाया हुआ 'नियम' शब्द ज्ञापक है नियामक नहीं है । यदि ऐसा न माना जाए तो उसको अनर्थकप ने का प्रसंग या जाएगा।
शङ्का-इस 'नियम' शब्द के द्वारा क्या ज्ञापित होता है ? __समाधान–इससे यह ज्ञापित होता है कि 'सम्यग्मिध्यादृष्टि, संयतासंयत और संयत जीव नियम से पर्याप्तक होते हैं' यह सुत्र अनित्य है । इससे उत्तर शरीर को उत्पन्न करने वाले सम्यग्मिथ्यादृष्टि, संयतासंयत और संयतों के तथा कपाट, प्रतर और लोकपुरण समुद्घात प्राप्त केवलियों के अपर्याप्तपना सिद्ध हो जाता है।
शा- जिसका प्रारम्भ किया हुआ शरीर अर्ध अपूर्ण है उसे अपर्याप्त कहते हैं, परन्तु सयोगी अवस्था में शरीर का प्रारम्भ तो होता नहीं अतः मयोगकेबली के अपर्याप्तपना नहीं बन सकता?
समाधान- नहीं, क्योंकि कपाट आदि समुद्घात अवस्था में सयोगकेवली छह पर्याप्तिरूप शक्ति से रहित होते हैं अतएव वे अपर्याप्त कहे गये हैं।'
केवलीसमुद्घात अवस्था में वचनबल (वचनयोग) व श्वासोच्छ्वास का अभाव हो जाने से मात्र काययोग रह जाता है इसीलिए गाथा में समुद्घातगत के स्थान पर काययोगी कहा गया है।
लपपर्याप्त, नित्यपर्याप्त व पर्याप्तावस्था में सम्भावित गुगास्थान लद्धिअपुण्णं मिच्छे, तत्थवि विदिये चउत्थ छ8 य ।
रिणब्यत्तिनपज्जत्ती, तत्यधि सेसेसु पज्जत्ती ॥१२७॥ गाथार्थ--लब्ध्यपर्याप्तकजीव मिथ्यादृष्टि होते हैं । नित्यपर्याप्तक नीव मिथ्यात्व, सासादन, असंयतसम्यग्दृष्टि व प्रमत्तविरत गुणस्थानों में होते हैं। पर्याप्तजीव उक्त गुणस्थानों में और शेष गुणस्थानों में होते हैं।
विशेषार्थ--लबध्यपर्याप्तकजीव मिथ्यादृष्टि गुणस्थान में ही होते हैं, अन्य गुणस्थानों में । लब्ध्यपर्याप्तक जीव नहीं होते हैं। सासादनगुणस्थान में लब्ध्यपर्याप्तक जीव उत्पन्न नहीं होते । सम्यग्मिथ्यादृष्टियों, असंयतसम्यग्दृष्टियों, देशसंयतों और सकलसंयतों में लब्ध्यपर्याप्तकजीब नहीं होते । नित्यपर्याप्तकजीव मिथ्यात्व (प्रथम), सासादन (द्वितीय), असंयतसम्यग्दष्टि (चतुर्थ) और प्रमत्तसंयत (छठे) गुणस्थान में होते हैं। इससे आगे के गणस्थानों में नहीं होते। सम्यग्मिथ्यात्व (तृतीय) गुणस्थान में और देशसंयत (पाँचवें) गुणस्थान में भी नित्यपर्याप्तकजीव नहीं होते।
शङ्का–प्रमत्तसंयतगुणस्थान में नित्यपर्याप्त कैसे सम्भव है ? क्योंकि अपर्याप्तावस्था में संयम असंभव है।
समाधान---शंकाकार प्रागम के अभिप्राय को नहीं समझा । आगम का अभिप्राय
१. ध पु. २ पृ. ४४१-४४४ । २. लब्ध्याप्तेिषु मिध्याइष्टिब्यतिरिक्तशेषगुणासम्भयात् । (प. पु. १ पृ. २०८)।