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________________ गाया १२६ पर्याप्ति/१६६ हैं।' इस प्रकार सूत्र में निर्देश होने के कारण यही सिद्ध होता है कि सयोगवली के अतिरिक्त अन्य औदारिकमिश्रकाय योगवाले जीव अपर्याप्तक हैं । समाधान--1ोसा नहीं है, क्योंकि 'पाहारकमिश्रकाययोग अपर्याप्तकों के होता है। इस सूत्र से संयत भी कथंचित् अपर्याप्तक सिद्ध होते हैं। शङ्खा-'पाहारकमिश्रकाययोग अपर्याप्तकों के होता है' यह सूत्र अनवकाण है, अर्थात् इस सूत्र की प्रवृत्ति के लिए कोई दूसरा स्थल नहीं है अतः इस सूत्र से संपत नियम मे पर्याप्तक होते हैं। यह सूत्र वाधा जाता है, किन्तु औदारिकमिश्रकाययोग अपर्याप्तकों के ही होता है, इस सूत्र से 'संघत पर्याप्तक हो होते हैं' यह सूत्र नहीं बाधा जाता, क्योंकि 'पीदारिकमिश्रकाययोग अपर्याप्तकों के होता है' यह सूत्र सावकाश होने के कारण (इस सूत्र को प्रवृत्ति के लिए सयोगियों के अतिरिक्त अन्य स्थल भी होने के कारण) निर्बल है। अत: माहारक समुद्घात जीवों के जिस प्रकार अपर्याप्तपना सिद्ध किया जा सकता है, उस प्रकार समुद्घात केवलियों के अपर्याप्तपना सिद्ध नहीं किया जा सकता ? समाधान नहीं, क्योंकि 'संयत नियम से पर्याप्तक होते हैं यह सूत्र भी सावकाण देखा जाता है (सयोगी के अतिरिक्त अन्य स्थल में भी इस सूत्र की प्रवृत्ति देखी जाती है ।) अतः निर्बल है और है इसलिए 'औदारिकमिश्रकाययोग अपर्याप्तकों के ही होता है' इस सूत्र की प्रवृत्ति को नहीं रोक सकना ! शङ्का--पूर्वोक्त दोनों सूत्र सावकाश होते हुए भी सयोगोगुणस्थान में युगपत् प्राप्त होते हैं । फिर भी 'परो विधिधिको भवति' 'संयतजीव नियम से पर्याप्तक होते हैं। इस सूत्र के द्वारा 'ग्रौदारिकमिनकाययोग अपर्याप्तकों के ही होता है' यह सूत्र बाधा जाता है, क्योंकि यह सूत्र पर है । समाधान--नहीं, क्योंकि 'पर' शब्द 'इष्ट' अर्थ का वाचक है। ऐसा मान लेने पर 'संयनजीव नियम से पर्याप्तक होते हैं। इस सूत्र के द्वारा 'औदारिकमिश्रकाययोग अपर्याप्तकों के होता है यह सूत्र बाधा जाता है, उसी प्रकार पूर्व अर्थात् 'औदारिकमिश्रकाययोग अपर्याप्तकों के होता है, इस सूत्र से संयतजीव नियम से पर्याप्तक होते हैं। यह सूत्र भी बात्रा जाता है अत: शंकाकार के पूर्वोक्त कथन में अनेकान्नदोष आ जाता है । शा-'संयतजीब नियम से पर्याप्तक होते हैं। इस सूत्र में 'नियम 'शब्द सप्रयोजन है या निष्प्रयोजन ? समाधान- इन दोनों पक्षों में दूसरा पक्ष तो माना नहीं जा सकता, क्योंकि श्री पुष्पदन्त प्राचार्य के बचन द्वारा कहे गये तत्वों में निरर्थकता होना विरुद्ध है और सूत्र की नित्यता का प्रकाशन करना भी "नियम' शब्द का फल नहीं हो सकता है, क्योंकि ऐसा मानने पर जिनसूत्रों में 'नियम' शब्द नहीं पाया जाता है, उन्हें अनित्यता का प्रसङ्ग आ जाएगा। परन्तु ऐसा है नहीं, क्योंकि ऐसा मानने पर 'प्रौदारिककाययोग पर्याप्तकों के होता है' इस सूत्र में 'नियम' शब्द का अभाव होने से अपर्याप्तकों में भी औदारिककाययोग के अस्तित्व का प्रसङ्ग प्राप्त होगा जो कि इप्ट नहीं है । अतः १. 'सम्मामिच्छाइदिठ-मजदासं जद-संजद-ट्ठाणे णियमा पज्जत्ता' IIEI (घ. पु. १ पृ. ३२६) । २. 'माहारमिस्सकावजोगो अपज्जत्ताणं । (घ. पु. १ मुब ७८) ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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