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________________ गाथा १२६ पर्याप्ति/१६५ । पर्याप्त मनुष्य व तिर्यंच की जघन्य आयु अन्तमुहूर्त प्रभारण है, किन्तु लब्ध्यपर्याप्त मनुष्य व तिर्यंच की जघन्य आयु उच्छ्वास के अठारहवेंभाग प्रमाण है। इस सम्बन्ध में निम्नलिखित श्लोक द्रष्टव्य है प्रायुरन्तमुहूर्तः स्यादेषोस्याष्टादशांशकः । उच्छ्वासस्थ जघन्यं च नृतिरिश्चां लवध्यपूर्णके ।। उच्छ्वास के अठारहवें भाग से ३६८५१ उच्छ्वास प्रमाग अन्तर्मुहूर्त को भाग देने पर [१३५६६ ६६३३६ लध्यपर्याप्तकों के क्षुद्रभव होते हैं। अर्थात एक जीव निरन्तर लब्ध्यपर्याप्तकों में उत्पन्न होता रहे तो वह अधिक से अधिक ६६३३६ बार उत्पन्न हो सकता है। इन ६६३३६ क्षद्रभवों में से ६६१३२ क्षद्रभव एकेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक सम्बन्धी हैं। द्वीन्द्रिय-श्रीन्द्रियचतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तकों के क्रमश: ८०-६०-४०-२४ क्षद्रभव होते हैं। ये सब मिलकर (६६१३२ + ८० ५. ६० + ४० + २४ =)६६३३६ क्षुद्र भब होते हैं। इस सम्बन्ध में श्री कुन्दकुन्दाचार्य ने भी भावपाड़ में कहा है छत्तीसं-तिषिण-सया-छावद्विसहस्सवार मरणाणि । अंतो मुत्तमम्झे पत्तोसि निगोयवासम्हि ।।२।। विलिवए असीदी सट्ठी चालीसमेव जाणेह । पंदिदि शमी गुदमरतो मुहत्तस्स ॥२६॥ उपर्युक्त एकेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक सम्बन्धी ६६१३२ भवों का खुलासा इस प्रकार है-सूक्ष्मपृथ्वीकायिक के ६०१२, बादरपृथ्वीकायिक के ६०१२, सूक्ष्म अकायिक के ६०१२, वादर प्रकायिक के ६०१२, सूक्ष्मतेजकायिक के ६०१२, बादरतेजकायिक के ६०१२, सूक्ष्मवायुकायिक के ६०१२, दरबायुकायिक के ६०१२. सूक्ष्मसाधारण बनस्पतिकायिक के ६०१२, बादर साधारण बनस्पतिकायिक के ६०१२, प्रत्येक वनस्पतिकायिक के ६०१२। इसी प्रकार पंचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक के २४ भव इस प्रकार हैं-मनुष्य लब्ध्यपर्याप्तक के ८, असंज्ञी पंचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक तिर्यच के ८, संजी पंचेन्द्रिय लब्ध्यपर्याप्तक तियंत्र के ८ क्षुद्रभव हैं । - - समुदपात अवस्था में केवलियों की अपर्याप्तता का कारण पज्जत्तसरीरस्स य, पज्जत्तुदयस्स कायजोगस्स । जोगिस्स अपुण्णत्तं अपुण्णजोगोत्ति रिणद्दिळं ॥१२६।। गाथार्थ पर्याप्त पारीरवाले तथा पर्याप्त नामकर्मोदयवाले काययोगी के अपर्याप्तता अर्थात् अपूर्ण योग कहा गया है ।।१२६॥ १. गो. सा. जी. मा १२५ की टीका से उद्धृत । २. पवेन्द्रियलमध्यपर्याप्त के चतुधितिः (२४), अतु मनुष्यलबध्यपर्याप्तकेऽष्टी (5), असंज्ञिप चेन्नियलमध्यपर्याप्तकेऽष्टो (८), संज्ञिपंचेन्द्रिये लब्ध्यपर्याप्तकेऽष्टो (८) मिलित्वा पवेन्द्रिपलब्ध्यप प्रीप्तके चतुर्विशतिर्भवन्ति (२४); स्वा. का. प्र. गा. १२७ की टीका ।
SR No.090177
Book TitleGommatsara Jivkand
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNemichandra Siddhant Chakravarti, Jawaharlal Shastri
PublisherRaghunath Jain Shodh Sansthan Jodhpur
Publication Year
Total Pages833
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari, Philosophy, Religion, & Principle
File Size22 MB
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